वैश्विक व्यापार मे अवसर

इन दिनों भारत के लिए देश और दुनिया में नए आर्थिक मौके बढ़ने का परिदृश्य बन रहा है। एक ओर जहां भारत में तेजी से बढ़ती बौद्धिक संपदा के कारण ये मौके बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर वैश्विक मंदी की आहट के बीच भारत के लिए नए अवसरों की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं। हाल में अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स के वैश्विक नवोन्मेष नीति केंद्र  जीआइपीसी) की ओर से जारी अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा (आइपी) सूचकांक 2019 में पचास अर्थव्यवस्थाओं में भारत ने छत्तीसवां स्थान हासिल किया है। यह 2018 में हासिल  चवालीसवें स्थान से आठ स्थान ऊपर है। नया आइपी सूचकांक तैयार करते समय प्रतिस्पर्धात्मकता पर वैश्विक बाजार में आंकड़े आधारित विचार, कारोबारी समुदाय द्वारा इस्तेमाल  किए जाने वाले मानदंडों जैसे पैंतालीस क्षेत्रों के आंकड़ों को आधार बनाया गया है। जीआइपीसी के मापदडों में व्यापार गोपनीयता का संरक्षण, पेटेंट और कॉपीराइट प्रमुख रूप से  सम्मिलित हैं।
इन मापदंडों पर ज्ञान आधारित उद्योग-कारोबार का विकास, स्टार्टअप, घरेलू कारोबारियों और विदेशी निवेशकों के निवेश निर्भर करते हैं। जहां बौद्धिक अधिकार संपदा का एक पक्ष रचनात्मक होता है, तो दूसरा पक्ष कारोबार से संबंधित होता है। रचनात्मक कार्यों के लिए कॉपीराइट का अधिकार होता है, जबकि कारोबार के उद्देश्य से किए गए किसी आविष्कार को  यह अधिकार पेटेंट के रूप में दिया जाता है।
पिछले दिनों दुबई में वैश्विक आर्थिक प्रबंधन शिखर सम्मेलन में नोबेल पुरस्कार विजेता अथर्शास्त्री पॉल क्रुगमैन ने चेतावनी दी कि दुनिया आर्थिक मंदी की तरफ बढ़ रही है और आर्थिक नीतियां बनाने वालों के बीच तालमेल और तैयारियों की कमी के कारण 2019 के अंत या फिर 2020 की शुरुआत में दुनिया वैश्विक आर्थिक मंदी की चपेट में आ सकती है।  आर्थिक मंदी की ऐसी आशंकाओं को बढ़ते हुए वैश्विक व्यापार युद्ध और चीन की आर्थिक सुस्ती से भी बढ़ावा मिल सकता है। ऐसे में भारत के लिए आर्थिक चुनौतियों के बीच कई  आर्थिक मौके उभरकर दिखाई दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सात फरवरी को संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक व्यापार से संबंधित रिपोर्ट में कहा कि अमेरिका-चीन के बीच व्यापार युद्ध से  वैश्विक कारोबार की गति धीमी हो सकती है, लेकिन भारत के निर्यात में वर्ष 2019 में 3.5 फीसदी की वृद्धि हो सकती है। इसी तरह हाल ही में चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो (एनबीएस) ने कहा है कि चीन में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर वर्ष 2018 में घट कर 6.6 फीसदी पर आ गई है। यह दर सन 1990 से यानी पिछले अठ्ठाइस वर्षों में  अब तक की सबसे धीमी जीडीपी वृद्धि दर है। इससे यह संकेत मिलता है कि चीन की अर्थव्यवस्था में धीमापन आ रहा है। ऐसे में अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि चीन की मंदी भी  भारत के लिए आर्थिक मौके बढ़ाने वाली हो सकती है। गौरतलब है कि चीन की अमेरिका के साथ कारोबारी जंग से चीन में अमेरिका से आने वाले ऐसे सामान की आवक कम हो  गई है, जिनका निर्यात भारत भी चीन को करता है। भारत से चीन के बाजार में इन वस्तुओं का निर्यात अमेरिका- चीन के बीच कारोबारी जंग के चलते बढ़ गया है। ट्रंप प्रशासन के कठोर रुख के कारण अमेरिका की फर्में चीन के साथ सौदे करने में डर रही हैं। चीन इस समय श्रम आधारित उत्पादों के विनिर्माण से दूर हो रहा है। उसका ध्यान मूल्यवृद्धि और  प्रदूषण घटाने पर केंद्रित होने से देश भर में इकाइयां बंद हो रही हैं। ऐसे में भारत से कपास, लौह अयस्क, कार्बनिक रसायन और विर्निमित उत्पादों के लिए चीन में नई बाजार  संभावना दिखाई दे रही है। पिछले साल जून से लेकर नवंबर 2018 के बीच भारत से चीन को निर्यात में बत्तीस फीसदी बढ़ोतरी हुई। कार्बनिक रसायन, लौह अयस्क और कपास जैसे  कच्चे माल की बड़ी मात्रा में चीन की जरूरत बढ़ती जा रही है। इन पदार्थों की हिस्सेदारी भारत से चीन को होने वाले 13.33 अरब डॉलर निर्यात बास्केट में 70 फीसदी से ज्यादा है।
नि:संदेह चीन की अमेरिका के साथ चल रही कारोबारी जंग के कारण भारत से अमेरिका को निर्यात में वृद्धि हो रही है। यह भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि अमेरिका में चीन से  आयातित की जाने वाली कई वस्तुओं के आयात मे भारी कमी आई है। चीन में आर्थिक मंदी और कामगार आबादी की कमी के कारण बढ़ती श्रम लागत बढ़ी है, इससे चीन में निवेश  घट रहे हैं और औद्योगिक उत्पादन में मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। दुनिया के निवेशक बड़ी संख्या में चीनी बाजारों के बजाय नकदी का प्रवाह भारत सहित नई उभरती अर्थव्यवस्था  वाले बाजारों की ओर प्रवाहित करते हुए दिखाई दे रहे हैं। भारत अमेरिकी उद्योग, कारोबार और कंपनियों के लिए नया निवेश केंद्र बन सकता है। चूंकि कई अमेरिकी कंपनियां लगातार चीन में उद्योग कारोबार करने में बढ़ती दिक्कतों की शिकायत कर रही हैं। ऐसे में गुणवत्तापूर्ण उत्पादन में चीन से अच्छी स्थिति रखने वाला भारत अमेरिकी अर्थव्यवस्था  में चीन की जगह ले सकता है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत चीन और पश्चिमी देशों को पछाड़ कर दुनिया का नया कारखाना बन सकता है। स्थिति यह है कि कई आर्थिक मापदंडों पर भारत  अभी भी चीन से आगे है। विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में भारत ने विश्व की एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति के तौर पर पहचान बनाई है। भारत के पास कुशल पेशेवरों की फौज है।  आइटी, सॉफ्टवेयर, बीपीओ,  फार्मास्युटिकल्स, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक, रसायन एवं धातु क्षेत्र में दुनिया की जानी-मानी कंपनियां हैं। आर्थिक और वित्तीय क्षेत्र की शानदार संस्थाएं  हैं।
वैश्विक आर्थिक अध्ययन बता रहे हैं कि आने वाले वर्षों में भारत दवा निर्माण, रसायन निर्माण और जैवत कनीकी के क्षेत्रों में सबसे तेजी से उभरने वाला देश बनेगा। भारत की  श्रमशक्ति का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि इस समय भारत में श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती भी है। भारत की पहचान प्रतिभाओं के गढ़ के रूप में है। इसमें कोई दो-मत  नहीं कि उद्योग- कारोबार और प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में किए जा रहे विभिन्न प्रयासों से भारत दुनिया के परिदृश्य पर तेजी से उभरता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत में सूचना-प्रौद्योगिक  क्षेत्र में नवाचार और नई प्रौद्योगिकी के लिए दुनिया की कंपनियां तेजी से कदम बढ़ा रही हैं। अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां नई प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में  भारतीय आइटी प्रतिभाओं के माध्यम से नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारत में अपने ग्लोबल इन हाउस सेंटर (जीआइसी) खोल रही हैं। इंटरनेट ऑफ थिंग्स, कृत्रिम बुद्धिमता और  डाटा विश्लेषण जैसे क्षेत्रों में शोध और विकास को बढ़ावा देने के लिए लागत और प्रतिभा के अलावा नई प्रोद्यौगिकी पर नवोन्मेष और स्टार्टअप माहौल के चलते दुनिया की कंपनियों  ने भारत की ओर रुख किया है। देश में जिस तरह प्रतिभाओं का उपयोग बढ़ रहा है, उसी तरह से एक बार फिर इस समय अमेरिका सहित दुनिया के अधिकांश देशों में भारतीय  प्रतिभाओं के लिए नई संभावनाएं बन रही हैं।
यदि हम देश की बढ़ती हुई बौद्धिक संपदा दुनिया में आर्थिक मंदी की आशंकाओं, चीन की घटती हुई विकास दर और अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध के परिदृश्य के बीच  उभरते हुए नए आर्थिक मौकों को अपनी मुठ्ठियों में लेना चाहते हैं, तो हमें कई बातों पर ध्यान देना होगा। हमें आर्थिक सुधार तेज करने होंगे। देश में कर सरलीकरण को आगे बढ़ाना  होगा। जीएसटी को सरल करना होगा। निश्चित रूप से ऐसा होने पर ही भारत विकास की डगर पर तेजी से आगे बढ़ेगा।

- जयंतीलाल भंडारी

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