सीएम के जिले गोरखपुर में 19 मई को होगा मतदान

गोरखपुर
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिले गोरखपुर में मतदान सातवें चरण में 19 मई को होगा। यहां सदर लोकसभा सीट पर 1989 से मार्च 2018 तक भाजपा का कब्जा रहा। 1998 से 2017 में मुख्यमंत्री बनने तक योगी आदित्यनाथ ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद मार्च 2018 में हुए उपचुनाव में सपा प्रत्याशी प्रवीण निषाद ने भाजपा उम्मीदवार उपेंद्र शु ल को हरा कर 29 साल बाद यह सीट भाजपा से छीन ली थी। मार्च 2018 में हुए उपचुनाव में सपा-बसपा के साथ आने से गोरखपुर सीट के समीकरण बदल गए थे। 29 साल से चला आ रहा भाजपा का कब्जा खत्म कर प्रवीण निषाद जीत हासिल करने में कामयाब रहे थे। इस बार भी इस सीट पर भाजपा, महागठबंधन और कांग्रेस के बीच दिलचस्प मुकाबला होने की संभावना है। इस बीच भाजपा ने लगातार चुनावी अभियानों के साथ  ही सपा सहित दूसरे दलों से अलग-अलग जातियों के नेताओं को शामिल कर अपने समीकरण ठीक करने की कोशिश की है।
2019 के इस महासमर में इन नए समीकरणों और महागठबंधन, कांग्रेस की तैयारियों की परीक्षा होगी। देश में 1951-52 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए थे, तब गोरखपुर और  आसपास के जिलों को मिलाकर चार सांसद चुने जाते थे। 1951-52 में सिंहासन सिंह गोरखपुर दक्षिण से कांग्रेस के सांसद चुने गए थे। यही सीट बाद में गोरखपुर लोकसभा सीट  कहलाई। 1957 में गोरखपुर लोकसभा सीट से सिंहासन सिंह दूसरी बार चुनाव जीते। 1962 के चुनाव में पहली बार गोरक्षपीठ ने चुनावी राजनीति में पदार्पण किया। गोरखनाथ मंदिर  के तत्कालीन महंत ब्रह्मलीन दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा के टिकट पर मैदान में उतरे, लेकिन वह कांग्रेस के सिंहासन सिंह से कुछ वोटों के अंतर से हार गये। महंत दिग्विजयनाथ ने कांग्रेस को लगातार टक्कर दी, लेकिन चुनाव में पहली सफलता 1967 में मिली। दो साल बाद ही 1969 में उनका निधन हो गया। 1970 में उपचुनाव हुआ। तब उनके उत्तराधिकारी और गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ मैदान में उतरे। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की।
1971 के चुनाव में कांग्रेस के नरसिंह नरायण पांडेय ने यह सीट वापस ले ली। इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए चुनाव में भारतीय लोकदल के हरिकेश बहादुर जीते। उस चुनाव में गोरक्षपीठ से कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं था।1980 के चुनाव में हरिकेश बहादुर ने दोबारा जीत हासिल की। इस बार वह कांग्रेस के उम्मीदवार थे। 1984 में हरिकेश एक बार फिर लोकदल उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे, लेकिन तब कांग्रेस के मदन पांडेय ने उन्हें हरा दिया। 1989 के चुनाव में अयोध्या में धर्मसंसद के कहने पर राम मंदिर आंदोलन की अगुवाई कर रहे महंत अवेद्यनाथ फिर से चुनावी मैदान में उतरे। इस बार हिंदू महासभा के टिकट पर उन्होंने जीत हासिल की। 1991 में वह भाजपा उम्मीदवार के तौर पर लड़े और जीते। 1996 में बतौर भाजपा उम्मीदवार तीसरी बार उन्होंने इस सीट से जीत हासिल की। 1998 के चुनाव में उन्होंने अपने उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ को पहली बार मैदान में उतारा, जिन्होंने 1999, 2004, 2009 और 2014 में जीत का सिलसिला कायम रखा। 1998 में गोरखपुर सीट से जीतकर योगी देश के सबसे कम उम्र के सांसद बने थे।
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