सरकार का पुराने सिस्टम पर लौटने का फैसला

नई दिल्ली
आम चुनाव के ऐलान होने से ठीक पहले मोदी सरकार ने रोस्टर मुद्दे पर गहन चर्चा और नफानुकसान के आकलन के बाद पुराने सिस्टम पर लौटने का  फैसला लिया है। यह कदम  सरकार ने पूरी तरह से सोच- समझकर उठाया है। एससी-एसटी ऐक्ट में आर्डिनेंस लाने की हड़बड़ी को लेकर विवाद झेलने के बाद इस बार पूरी तरह सतर्क थी। खासतौर पर चुनावी  समर में अहम माने जाने वाले ओबीसी वोटरों की नाराजगी के डर से सरकार पसोपेश में थी। एक तरफ सवर्ण वोटर थे, जिन्हें गहरी नाराजगी के बाद दस फीसदी आरक्षण देकर  मनाने में सफलता में पाई थी तो एक तरफ ओबीसी, दलित और आदिवासी वोटर थे, जो हाल में भाजपा के लिए सबसे मजबूत वोट बैंक बन कर उभरे थे। एससी-एसटी ऐक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट कर आर्डिनेंस लाने के चलते सवर्ण भाजपा से नाराज हो गए थे, जिसका खामियाजा मध्य प्रदेश और राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा को  उठाना पड़ा था। ऐसे में इस बार सीधे तौर पर इस तबके को नाराज करने का दोबारा जोखिम नहीं उठा सकती थी। यही कारण है कि लगातार विरोध के बीच भी सरकार ने इस पर  साफ तौर पर कोई संकेत नहीं दिया था। संसद के बीते सत्र में विपक्ष लगातार हंगामा करता रहा, लेकिन सरकार ने कोई संकेत नहीं दिए। सरकार लगातार कह रही थी कि वह पहले  सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगी, लेकिन खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में इस मुद्दे पर ओबीसी संगठन मुखर होने लगे। कई स्तर पर इनका विरोध प्रदर्शन होने लगा।
आरजेडी, एसपी, बीएसपी और कांग्रेस ने इस मुद्दे को चुनाव से पहले तेजी से उठाना शुरू कर दिया। 5 मार्च को पूरे देश में बंद के अलावा धरना आयोजित हुआ। इसके तुरंत बाद  भाजपा हरकत में आई। बिहार और उत्तर प्रदेश की 120 सीटों के अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ओबीसी निर्णायक मतदाता हैं। दो दिन पहले मध्य प्रदेश  में सीएम कमलनाथ ने ओबीसी कोटा को बढ़ाने का फैसला लिया है। इन तमाम राज्यों में विपक्षी दलों ने ओबीसी वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए इसे सबसे बड़ा मुद्दा बनाया  और 10 फीसदी सवर्ण आरक्षण और उसके बाद रोस्टर विवाद को उनके खिलाफ भाजपा के रुख के रूप में प्रचारित किया।

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