पाक को डरने नहीं, सही राह पर चलने की जरूरत

हाल के दिनों में पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति को लेकर जैसी खबरें आ रही हैं, उससे यही लगता है कि उसे कई मोर्चों पर एक साथ जूझना पड़ रहा है, लेकिन उसे दुरुस्त करने के  लिए कोई ठोस पहलकदमी करने के बजाय वहां के नेताओं को इस बात की फिक्र ज्यादा लग रही है कि भारत क्या कर रहा है। हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने  कहा कि भारत 'युद्धोन्माद’ से ग्रस्त है और वहां चूंकि चुनाव है, इसलिए फिर से टकराव की आशंका है और इससे पाकिस्तान चिंतित है। सवाल है कि यह डर आखिर वहां के नेताओं  के मन में क्यों बैठ गया है कि भारत अब भी पाकिस्तान के सामने कोई खतरा पैदा कर सकता है। अव्वल तो ऐसा मौका शायद कभी नहीं आया है, जब भारत ने बिना किसी उकसावे के पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई की हो। दूसरे आतंकी हमलों के हद से गुजर जाने के बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई के तौर पर बालाकोट में हवाई हमला किया था, लेकिन  यह ध्यान रखने की जरूरत है कि भारत की ओर से हुआ वह लक्षित हमला मूल रूप से उन आतंकी संगठनों के खिलाफ था, जिनके बारे में ये तथ्य बार-बार उभरते रहे हैं कि उन्हें  पाकिस्तान की शह और शरण मिली हुई है। एक खबर के अनुसार मनी लांड्रिंग और आतंक का वित्तपोषण नहीं रोक पाने की वजह से पाकिस्तान पर अब एशिया प्रशांत समूह की  ओर से निगरानी सूची में डाले जाने का जोखिम मंडरा रहा है। इससे पहले पेरिस स्थित वित्तीय कार्रवाई कार्यबल पिछले साल पाकिस्तान को निगरानी सूची में डाल चुका है। भारत  लंबे समय से पाकिस्तान से यह कहता रहा है कि वह अपनी सीमा में स्थित ठिकाने से आतंकी गतिविधियां संचालित करने वाले आतंकी संगठनों पर लगाम लगाए, लेकिन भारत की  इस मांग को पाकिस्तान ने शायद ही कभी तवज्जो दी। यह बेवजह नहीं है कि जैश- ए-मोहम्मद या लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों का हौसला लगातार बढ़ता गया है और वे  भारत के सामने समय-समय पर चुनौती पेश करते रहे हैं। पिछले महीने पुलवामा में आतंकी हमले में जिस तरह सीआरपीएफ के बयालीस जवानों की जान चली गई, वह भारत की सहनशक्ति को पार कर गया था और तभी बालाकोट में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी शिविर पर हमला किया गया था। वरना भारत ने अधिकतम धीरज ही बनाए रखा और  कूटनीति के जरिए मसले को सुलझाने पर जोर दिया है। विचित्र है कि एक तरफ पाकिस्तान करतारपुर गलियारे पर नरम रुख अपना कर भारत के साथ संबंधों को सहज बनाने का  दावा करता है और दूसरी ओर अपने यहां के आतंकी संगठनों की गतिविधियां संचालित करने के मसले पर कोई ठोस कदम उठाने से हिचकता है। इस दोहरे रवैए के रहते पाकिस्तान  भारत से क्या उम्मीद करता है? पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान अक्सर दावा करते हैं कि अब वे नया पाकिस्तान बना रहे हैं। अगर वे अपने इस विचार को लेकर  ईमानदार हैं, तो बेहतर यह हो कि वे पाकिस्तान के भीतर शासन से लेकर विकास तक के दूसरे जरूरी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करें। आतंकी और कट्टरपंथी संगठनों को बढ़ावा देने की  पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने कितना कुछ गंवाया है, इसे इमरान खान शायद बेहतर महसूस कर रहे होंगे, तो उम्मीद है कि वे आतंकवाद संबंधी भारत की परेशानियों को भी समझने  की कोशिश करेंगे और इससे पूरी तरह मुक्ति का रास्ता तैयार करने में अपनी अहम भूमिका निभाएंगे।

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