प्रधानमंत्री ने दबा दी है दुखती नब्ज

दलित और पिछड़ों तथा वंचित वर्ग की कल्याण की कामना का दिखावा करते हैं तथा उसकी आड़ में राजनीति कर उनका फायदा उठाते हैं और सबकुछ उसका उलटा करते है।  प्रधानमंत्री द्वारा शनिवार को ऐसे लोहियावादियों को आइना दिखाने का काम किया गया है। लोहिया हमेशा गैर कांग्रेसवाद के प्रतीक थे, उन्होंने सर्वहारा के कल्याण के लिए काम  किया। किसान, मजदूर की आवाज बुलंद की, समतामूलक समाज की परिकल्पना ही नहीं की उसे मूर्त रूप देने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया। आज उनके अनुयाई बताने वाले  लोग चाहे वह आरएलडी हो या सपा या कोई और समाजवादी दल सब सिर्फ नाम के समाजवादी हैं, सबमें परिवारावाद का, जातिवाद का अपराधवाद को प्रश्रय का बोलबाला है और  सब आज भाजपा से भयभीत कांग्रेस के चारों ओर च€कर लगा रहे हैं।
सब पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े आरोप हैं और बिना कोई काम धंधा किए राजनीति के ही धंधे से जो इनकी माली हैसियत है, हमेशा उस पर उंगली उठती रहती है, शक के घेरे में रहती है। इन्होंने ने अपने नारों का मतलब किसी भी तरह से अपने आपको सत्ता में बनाए रखना मान लिया है और यही कारण है कि आज इनको मानने वाला, चाहने वाला वर्ग बड़ी  तेजी से इनसे दूर जा रहा है। कारण जिस उत्तर प्रदेश में इन दलों ने अलग-अलग मिलकर पिछले ढाई से तीन दशक शासन किया, वहां इन्होंने पार्क और स्मारक बनाने के सिवाय  ऐसा कुछ नहीं किया, जो यह बताए कि यह लोहिया की या दलित उत्थान की विचारधारा या समता मूलक समाज बनाने की दिशा में उठाया गया कोई कदम है। इनकीहर गतिविधि  सिर्फ और सिर्फ किसी भी तरह अपने आपको सत्ता में बनाए रखने की कवायद लगती है, जो बहुत चल चुकी। अब नई पीढ़ी इन सभी पैटर्न पर सवाल खड़ा करती है, जिसे पुराने  लोग अपनी नियति मानकर चुप रहते थे, जाति का मुलम्मा उस समय ढीला पड़ जाता है, जब लोगों को ऐसी राजनीति न करने वालों के शासन के काल में काम होता दिखता है। पर्याप्त बिजली मिलती है। सड़कें चकाचक दिखती हैं, शहरों का चेहर-मोहरा बदलता नजर आता है और वह भी जबकि दो साल नहीं पूरे हुए हैं, किसी का नाम लेने भर से कोई किसी  का अनुयाई नहीं हो जाता। उसके लिए वैसा आचारविचार और व्यवहार करना पड़ता है। विचारों पर वैसी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करना पड़ता है। यह समय भाजपा छोड़ सारे दलों में  है, कांग्रेस भी अतीत की कांग्रेस नहीं रही, उसमें जो पहले देश का बहुरंगी प्रतिबिंब झलकता था, जैसे ही उसमें संकुचन आया, उसका जनाधार भी सिकुड़ने लगा। उसे सपा-बसपा,  राजद जैसे उन दलों ने अपनी लोक लुभावनें वादों से अपनी ओर खींचा और उसका भरपूर दोहन किया, कभी सामाजिक न्याय का नाम लेकर कभी और कोई नाम देकर, कभी लोहिया  की दुहाई देकर कभी कुछ और गुल खिलाकर, परंतु यथार्थ में भला हुआ, तो उनके परिवारों और चाटुकारों का, जिसे अब जतना ने समझाना शुरू कर दिया है, तो इनका जनाधार रोज  खिसक रहा है और आज ये सब दल एक दूसरे को सहारा देकर, दूसरे दल की बैशाखी पकड़ कर अपने अस्तित्व को बचाने में लगे हैं। बेमेल और अटपटा लगने वाले गंठजोड़ कर रहे  है फिर भी बात बनेगी ऐसा नहीं लगता। कारण जनता विकास को तरजीह दे रही है, सही शासन को तरजीह दे रही है और जो ये दल कभी नहीं कर पाए वह करती भाजपा ही दिख  रही है। प्रधानमंत्री इन्हें यही याद दिला रहे थे कि कथनी और करनी में अंतर एकाध बार चलता है, बार-बार नहीं।

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