इस्लामिक मुल्कोंमे भी अलग थलग पडा पाकिस्तान

नई दिल्ली
अपनी कोख में दहशत के जहरीले नाग पाल रहे पाकिस्तान को संभवतया पहली बार इतना उपेक्षित और हताशा का शिकार होना पड़ा है। उसकी इतनी किरकिरी तो तब भी नहीं हुई  थी, जब अमेरिकी कमांडो ने ऐबटाबाद में आकर दुर्दांत आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतार दिया था, लेकिन आज पाकिस्तान के लिटमस टेस्ट की रिपोर्ट सभी  मुल्कों के सामने है। अब पाकिस्तान के सामने दो ही विकल्प हैं। आतंकवाद से अपने को मु€त करे अथवा अपने ही भस्मासुर के हाथों दुनिया के न€शे से विलोपित हो जाए। जाहिर है  हालात से सीखने वाला कोई भी देश पहले विकल्प का ही चुनाव करेगा मगर पाकिस्तान के लिए यह आसान नहीं है। इस बार उसकी हताशा का कारण €या है ? भारत का यह रौद्र  रूप तो उसने अड़तालीस,पैंसठ ,इकहत्तर और निन्यानवे में भी नहीं देखा था। हर बार उसने हिंदुस्तान की सदाशयता का गलत फायदा उठाया। जब जब भारत ने इस नकली मुल्क को  सबक सिखाना चाहा, अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में मौजूद पाकिस्तान के कुछ शुभचिंतक आड़े आ गए। इस बार ऐसा नहीं हुआ। एक तरफ पश्चिमी देशों ने दूरी बनाई तो यूरोप से भी  पाकिस्तान को समर्थन नहीं मिला। और तो और उसके अपने ही किनारा कर गए। सऊदी अरब, संयु€त अरब अमीरात और अमेरिका से लेकर चीन तक ने उससे मुंह मोड़ लिया।  आबूधाबी में इस्लामिक सहयोग संगठन के विदेश मंत्री सम्मेलन से ठीक पहले अमीरात ने तो हिंदी को अपनी तीसरी भाषा का स्मान दे दिया। इसके बाद इस सम्मेलन में उसने  पहली बार हिंदुस्तान को गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर बाकायदा न्यौता भेजा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस दो दिनी सम्मेलन में भारत का पक्ष मजबूती से रखा। पाकिस्तान को  जाहिर है कि ये रास नहीं आया। उसने खूब आंखें तरेरीं, फिर सम्मेलन के बहिष्कार की धमकी दी। आखिर सम्मेलन में उसकी कुर्सी खाली पड़ी रही। पाकिस्तान लगातार कश्मीर के  बहाने हिन्दुस्तान की इस संगठन में सदस्यता का विरोध करता रहा है। दरअसल, पाकिस्तान लगातार कश्मीर के बहाने हिंदुस्तान की इस संगठन में सदस्यता का विरोध करता रहा  है। भारत संसार की कुल मुस्लिम आबादी का तीसरा बड़ा देश है और उसके आने से 57 सदस्यों वाले इस संघ में पाकिस्तान का वर्चस्व समाप्त होगा। अभी तक वह इस मंच का  दुरुपयोग भारत की आलोचना के लिए करता रहा है।

पाकिस्तान से उठा मुस्लिम विश्व का भरोसा :-जनरल याढ्ढा खान की बायकॉट धमकी के मद्देनजर भारत के प्रतिनिधिमंडल को 1969 में इस संगठन के पहले स्थापना सम्मेलन से  बैरंग लौटना पड़ा था। इस प्रतिनिधिमंडल की अगुआई फखरुद्दीन अली अहमद कर रहे थे। इसके बाद 1990 में सऊदी अरब, 2002 में कतर, 2006 में फिर सऊदी अरब और पिछले  बरस टर्की और बांग्लादेश ने फिर भारत को शामिल करने का समर्थन किया था। अतीत में सऊदी अरब और टर्की जैसे देश पाकिस्तान के दबाव में भारत से दूरी बनाते रहे हैं। इस  बार पाकिस्तान की पोल खुल गई है।
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