बेकार के आरोप

चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा के साथ ही विपक्षी दलों ने बेकार के आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं। आम आदमी पार्टी (आप) के नेता और प्रवक्ता संजय सिंह ने इस मामले में ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा है कि चुनाव आयोग मतदान में हिस्सा लेने की अपील के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ 3  फेज का चुनाव पवित्र रमजान के महीने में रख कर मुस्लिम मतदाताओं की भागीदारी कम करने की योजना बनाई गई है। चुनाव आयोग को सभी धर्मों के त्यौहारों का ध्यान रखना  चाहिए। 'आप’ विधायक अमानतुल्लाह खान ने भी कहा कि 12 मई का दिन दिल्ली में रमजान होगा और मुसलमान कम वोट करेंगे। इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। वहीं,  कोलकाता के मेयर और तृणमूल कांग्रेस के नेता फरहाद हाकिम और ईदगाह इमाम मौलाना खालिद रशीद फिरंगी भी महली चुनाव की तारीखों से खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि  चुनाव के समय मुस्लिमों का रोजा होगा। इस बात पर चुनाव आयोग को ध्यान देना चाहिए था। हाकिम ने कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और हम उसका सम्मान करते हैं। हम उनके खिलाफ कुछ नहीं बोलना चाहते हैं, लेकिन 7 चरणों में चुनाव बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए मुश्किल होगा। यह उन लोगों के लिए  सबसे ज्यादा मुश्किल होगा, जिनका उस समय रमजान चल रहा होगा। उन्होंने कहा कि इन तीन राज्यों में अल्पसंख्यक आबादी काफी ज्यादा है। वे रोजा रखकर वोट डालेंगे। चुनाव  आयोग को इस बात का ख्याल रखना चाहिए था। भाजपा चाहती है कि अल्पसंख्यक अपना वोट न डालें। इस बीच एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि यह सारा  विवाद बेकार का है। इसकी कोई जरूरत नहीं है। मैं उन राजनीतिक दलों से गुजारिश करना चाहूंगा कि आप किन्हीं भी कारणों से मुस्लिम समुदाय और रमजान का इस्तेमाल न करें।  रमजान के दौरान मुसलमान जरूर रोजे रखेंगे। वे बाहर भी निकलेंगे, सामान्य जिंदगी जिएंगे। वे दफ्तर जाएंगे। सबसे गरीब भी रोजे रखेंगे। मुझे तो लगता है कि रमजान के महीने  में ज्यादा मतदान होगा, €योंकि इस महीने में लोग बाकी सांसारिक कर्तव्यों से दूर रहेंगे। भाजपा पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाने वाले आज रमजान को आधार बनाकर स्वयं  सांप्रदायिक और तुष्टिकरण की राह पर चल रहे हैं। चुनाव आयोग ने बड़े स्पष्ट शŽदों में कहा है कि चुनाव कार्यक्रम सभी मुख्य त्यौहारों और पर्वों को ध्यान में रखकर तैयार किया  गया है।
देश का दुर्भाग्य है कि देश के अल्पमत समुदायों का एक वर्ग आजादी के सात दशक बाद भी अपनी संकीर्ण सोच के कारण राष्ट्रहित की भी अनदेखी कर जाता है। पिछले दिनों  पुलवामा में हुए आतंकी हमले जिसमें 40 से अधिक सुरक्षा बलों के जवान शहीद हुए थे, उस हमले के जवाब में भारत सरकार के आदेश पर हवाई सेना ने पाकिस्तान स्थित आतंकी  अड्डों पर बम फेंककर उन्हें जवाब दिया था। आज हवाई हमले को चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है। नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अŽदुल्ला, पीडीपी की महबूबा मुफ्ती, सपा के  आजम खां के साथ-साथ कांग्रेस के कई नेता भारतीय सेना के हमले को लेकर किंतु-परंतु कर रहे है। जबकि आतंकी सरगना और पाकिस्तान सरकार मान रही है कि भारतीय हवाई  सेना ने हमला किया है और नुकसान भी हुआ है। भारत की राजनीति का गिरता स्तर इस बात से पता चलता है कि अब नुकसान कितना हुआ है इस को लेकर बहस हो रही है।  इसका लाभ पाकिस्तान अपनी छवि सुधारने में ले रहा है। उपरोक्त सभी आरोप बेकार के है, उनमें कोई दम नहीं है। हां, जन साधारण को भ्रमित करने के लिए ही उपरोक्त सब कुछ हो रहा है जो दु:खदायी भी है और देशहित में भी नहीं है। भारत में विभिन्न जातियों, संप्रदायों और धर्मों के लोग रहते हैं और संविधान ने सभी को बराबर के अधिकार दिए हैं।  उसी संविधान के तहत जब चुनाव आयोग चुनाव कराने जा रहा है, तो उस पर उंगली उठाई जा रही है। भारत के संविधान ने मतदाता को मतदान का जो अधिकार दिया है, उसका  इस्तेमाल मतदाता ने हमेशा से अतीत में जोर-शोर से किया है और अब भी करेगा। बेकार के आरोप से मतदाता का हौसला कम नहीं होने वाला।

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