अपराधी और सही आदमी में फर्क जरूरी

जब नफरत अपने चरम पर होती है, तो वह सबसे पहले व्यक्ति के विवेक पर पर्दा डालती है और उसके बाद व्यक्ति कैसी अमानवीय हरकतें करता है, कैसे एक सीधा सादा आदमी  हैवान बन जाता है, न्यूजीलैंड की घटना उसका ताजा उदाहरण है। एक व्यक्ति ने अपनी सनक में 49 निर्दोषों को क्रूरतापूर्वक मौत की नींद सुला दिया और तमाम लोगों को घायल कर दिया। आतंक और राष्ट्रवाद की बातें सुनकर,पढ़कर, देखकर कोई ऐसा भी कर सकता है, सहज विश्वास नहीं हो सकता। इसको देखकर जिस तरह न्यूजीलैंड का सभ्य समाज  चिंतित और बेहाल है, उसी तरह पूरी दुनिया का वह बहुमत भी आहत है, जो इस दुनिया की समग्र मानवता के विकास का, उन्नति का और आपसी सौहार्द का पैरोकार है, आकांक्षी  है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस्लाम धर्म अनुयायियों के एक वर्ग द्वारा सत्ता प्राप्ति के लिए, राजनय के लिए और अपना उल्लू सीधा करने के लिए शुरू किया गया आतंक का  कारोबार दुनिया के आक्रोश और चिंता का कारण है, जिसकी सर्वत्र भर्त्सना हो रही है। इसे नियंत्रित करने, खत्म करने के लिए विश्वस्तर पर प्रयास हो रहे हैं, परंतु इसका ऐसा भी असर होने लगेगा, ऐसा शायद किसी ने भी नहीं सोचा था। यह एक ऐसी प्रवृति है कि यदि यह बढ़ी, तो इसके काफी घातक परिणाम दुनिया और समाज को झेलने पड़ सकते हैं।  जैसे यह सही है कि आज आतंक के कारोबार में लगे लोगों में एक धर्म विशेष के लोगों का प्राधान्य है, वैसे ही यह भी सही है कि वे उ€त धर्म विशेष की कुल आबादी के बहुत थोड़े  से लोग हैं। इसके लिए दूरदराज के इलाकों के शांतप्रिय लोगों को निशाना बनाना, जो रोजी-रोटी के लिए बरसों से किसी दूसरे देश में आबाद हैं, सिर्फ और सिर्फ सनकी और पागल  मस्तिष्क के लोगों की उड़ान है और ऐसे तत्वों की जगह सभ्य समाज के बीच नहीं है। पूरी दुनिया को इस प्रवृति पर सामूहिक रूप से आघात करते हुए इसे तुरंत खत्म करना होगा।  साथ ही मुस्लिम समुदाय के उस बहुमत को उसी तरह से अपने समाज के आतंकियों के खिलाफ मुखर होना होगा, लामबंद होना होगा जैसे आज न्यूजीलैंड उस हत्यारे और इस प्रवृति
की निंदा करने में एकजुट है। आज की दुनिया छोटी हो रही है।
संसार एक गांव हो गया है इस नारे के बीच यह बात कहां से आ रही है कि जहां का जो मूल निवासी है, वहीं वह रहे और बाहरी को कहीं जगह न मिले। राष्ट्रवाद के नाम पर जो  नारेबाजी का दौर दुनिया में चल रहा था, उसका ध्येय राष्ट्रभावना को मजबूत करना है, परंतु कोई उसका यह मतलब निकाले कि इसका मतलब दूसरे देश के लोगों को बाहर करना  है, उनकी हत्या करनी है तो फिर यह दुनिया लाशों का ढेर होगी। इसलिए आवश्यक है कि इस प्रवृति के खिलाफ विश्वव्यापी अभियान शरू हो। दुनिया एक ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें  तरह-तरह के फूल लगे हैं और जो इसके आकर्षण में वृद्धि करते हैं, जाति,धर्म, समाज, व्यवस्था, वर्ग, रंग, भेद सब मानवनिर्मित हैं। ईश्वर ने सबको मनुष्य बनाया है इसलिए हम सबको मनुष्य ही मानें और मानवमात्र के कल्याण के लिए कार्य करने, कोई अमुक धर्म का है, इसलिए वह सही नहीं, यह तर्क ही गलत है। आतंक का कोई धर्म नहीं होता, यह इस  बात से तसदीक होता है कि सीरिया, इराक, इरान, पाकिस्तान और हमारे जम्मू- कश्मीर में आतंकी जिन पर हमला कर रहे हैं। जिनकी जान ले रहे हैं। उनमें अधिकांश उनके ही  धर्मावलंबी हैं। वे इस बात का कहां अनुपालन कर रहे हैं। संक्षेप में आतंकियों का कोई धर्म और ईमान नहीं है। इसलिए उनके कृत्यों के लिए कही भी उनके धर्म वाले को निशाना  बनाना अनुचित है, पाप है, अपराध है। आतंकियों, उनके सरपरस्तों उनके संरक्षकों से कोई दया,माया न दिखाई जाए,परंतु उसके नाम पर निर्दोषों को निशाना न बनाया जाए। यह निंदनीय और अस्वीकारणीय है। आवश्यक है कि ऐसे हर कदम का विरोध हो, जो मनुष्य को मनुष्य की नजर से नहीं देखता और जो ऐसे हादसों का कारक बनता है। अपराधी और  सही आदमी में फर्क जरूरी है। सबको एक तराजू से नहीं तौल सकते।

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