लापरवाही पर सरकार सख्त

अभी एल्फिंस्टन और अंधेरी पुल हादसे की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि एक और हादसे ने छह लोगों की बलि ले ली और लगभग तीन दर्जन लोगों को घायल कर दिया। कुशल है  कि सीएसएमटी के पास स्थिति यह फुट ओवर ब्रिज उस समय ढहा जब सिंग्नल बंद था, नहीं तो इस हादसे का असर और व्यापक होता न जाने और कितनी जानें जातीं।
अभी हाल में उ€त दोनों घटनाओं के बाद पुलों का ऑडिट का काम बड़े जोरों-शोरों से हुआ था। कारण उक्त दोनों घटनाओं के चलते काफी हाय-तौबा मची थी और सरकार ने पुलों की  जांच पड़ताल का कड़ा आदेश दिया था। बताया जाता है कि इस पुल का भी ऑडिट हुआ था, जिसमें मामूली मरम्म्त की आवश्यकता जताई गई थी। परिणामत: जहां गंभीर मरम्म्त  की आवश्यकता थी, वहां काम हो रहा है और मामूली मरम्म्त की आवश्यकता वाला यह पुल ढह गया अच्छा है कि सरकार ने इस पुल की देख-रेख के जिम्मेदार एजेंसियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है। कारण इसे पूरे प्रकरण की सांगोपांग जांच आवश्यक है, साथ ही ऑडिट करने वाली उस टीम से भी यह पूछ जाना चाहिए कि जब इसमें मामूली  मरम्म्त की जरूरत थी, तो फिर यह ताश के पत्ते की तरह ढह कैसे गया? साथ ही जो भी इसके जिम्मेदार हैं उनके खिलाफ सख्त और उदाहरणीय कार्रवाई समय की मांग है। हमारे  देश में शताब्दियों पुराने पुल हैं। जिन पर आज भी ठाठ से आवागमन जारी है और हमारे निर्माण कब धसक जाते हैं पता ही नहीं चलता।
सार्वजनिक निर्माणों का यह सूरते हाल केवल मुंबई महानगर या महाराष्ट्र राज्य तक ही सीमित नहीं है। यह देशव्यापी बीमारी है। सड़कें बनती हैं और बनने के कुछ दिनों में गड्ढों में  तब्दील होने लगती हैं। भवन जब बनते है, रंग- रोगन लगाकर उन्हें एक चमकदार रूप में प्रस्तुत किया जाता है उसके बाद उनके क्षरण का सिलसिला शुरू होता है, जो निर्माण के  दौरान की गई कतरŽयोंत और बेईमानी का पूरा कच्चा चिठ्ठा हमारे सामने खोल कर रख देता है। कारण पहले तो निर्माण स्तरीय नहीं होता और बाद में जिन पर देखरेख की जिम्मेदारी  होती है वे भी अपने दायित्वों का सही से निर्वाह नहीं करते और जो अंतत: ऐसे हादसों के कारक बनते हैं। ऐसे ही क्रिया-कलाप का परिपाक एल्फिंस्टन हादसा था, बाद में अंधेरी और  अब यह हादसा हमारे सामने है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस पहली ही घटना के बाद से ऐसे मामलों पर काफी सख्त हैं, परंतु नौकरशाही का पहिया अपनी गति से दौड़ता है और उसकी  मरगल नहीं छूट रही है, नहीं तो यदि उक्त मामूली मरम्म्त पहले ही हो जाती, तो इतने लोग हताहत नहीं होते। यह लापरवाही नहीं घोर लापरवाही है और इसके लिए जो भी दोषी  हों, उन पर यथोचित और सख्त कारवाई होनी चाहिए।
हमारे यहां सारी व्यवस्थाएं है। मरम्म्त और देख-रेख के लिए विभाग हैं। जिम्मेदार अधिकारी है, कर्मचारी है, अभी थोड़े अंतराल में दो हादसे हो चुके है। सारे पुलों का मूल्यांकन हुआ  है इसके बाद फिर उपचारात्मक कदम €यों नहीं उठाए गए। इस पर पूरी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। कारण ऐसी लापरवाहियां लोगों की जान लेती हैं। उन्हें अंगभंग करती  है और प्रकारांतर से कई परिवारों के जीवन के साथ खिलवाड़ करती हैं, जिसकी भरपाई किसी भी मुआवजे से नहीं हो पाती। वैसे मुख्यमंत्री और सरकार का कड़ा रूख इस बात का  पर्याप्त संकेत दे रहा है कि इस बार दोषी बख्शे नहीं जाएंगे और जो भी जिम्मेदार होगा, उन्हें उसका फल भोगना होगा।

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