अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी

आज महिला दिवस है। आज जगह-जगह कार्यक्रम, गोष्ठियां आयोजित होंगी, होना भी चाहिए। कारण महिला हमारी आधी आबादी है, यदि हमारी आधी आबादी पीछे रहेगी, तो देश  पीछे रहेगा। इसलिए हमें इस आबादी का विशेष गौरव करते हुए इसे सिर्फ दिन विशेष तक नहीं सीमित रखना चाहिए, बल्कि यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता का ध्यान रखते  हुए हमेशा उन्हें लेकर सचेत रहना चाहिए और जहां कहीं भी महिला उत्पीड़न या कोई और बात समाने आए मुखर होकर उसका विरोध करना चाहिए, प्रतिकार करना चाहिए। हम  दुनिया की बात नहीं करते हमारे देश में महिलाओं की स्थिति में स्वतंत्रतता के अब तक के सात दशकों में काफी बदलाव आया है। आज महिलाएं चाहे वह मानव विकास या मानवीय  जौहर दिखाने का कोई भी क्षेत्र हो अपनी काबलियत का डंका बजा रही हैं। यहां तक सेना और कई ऐसे क्षेत्र जिन पर पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था। आज वैसा नहीं हैं। संक्षेप  में जमीन से लेकर आसमान तक, समुद्र से लेकर अंतरिक्ष तक हर जगह उनकी क्षमता और काबलियत का लोहा माना जा रहा है। आदि ायुगीन रूढ़ियों के चलते जो भेदभाव होता  था, लड़की और लड़के में वह भी यदि पूरी तरह खत्म नहीं है, तो भी काफी बदलाव हो रहा है और वह बड़ी तेजी से हो रहा है आज हर कोई बेटे की तरह अपनी बेटी को भी पढ़ाना  चाहता है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें भी इसमें अच्छा खासा योगदान दे रही हैं और पुरातन काल से चली आ रही रूढ़ियों को बदलने के लिए सतत् और सरहनीय प्रयास कर रही  हैं। वह हर सहयोग करीब-करीब मुफ्त उपलब्ध काराया जा रहा है, जो कन्या के विकास के लिए जरूरी है, परंतु बात यहीं खत्म नहीं है। कारण कुरीतियां और रूढ़ियां जल्दी नहीं  मरती, समय लेती है। आज भी दहेज के नाम पर और कई तरह की उत्पीड़न यौन, शोषण, छेड़छाड़ और न जाने कितने शत्रु मुह बाए खड़े हैं, जिसके चलते हमारी आधी आबादी  काफी कठिनाई का सामना करती है।
लड़का और लड़की में भेदभाव अभी तक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, इस सब कारणों से आज भी महिलाएं काफी सं या में असमय काल के गाल में समा रही हैं एक दौर ऐसा था  कि हमारे देश के कई राज्यों में स्त्री-पुरुष औसत खतरे की घंटी बजा रहा था। सौभाग्य से अब इस और स्थित सुधार पर है इसमें हमारे सरकार की 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना और नया योजानाओं का काफी योगदान है, जो हमारी केंद्र और राज्य सरकार समय-समय पर कार्यान्वित कर रही है। जागरूकता फैलाने में इसके अलावा गैर सरकारी संगठनों का भी  प्रयास उल्लेखनीय है, तो आइए महिला दिवस के इस अवसर पर हम सब मिलकर ऐसा संकल्प लें कि हम महिला उत्थान का काम उन्हें उत्पीड़न से मुक्ति का काम तब तक जारी रखेंगे, जब तक हमारे समाज से ऐसी बातें पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती। कारण स्त्री और पुरुष जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। यदि इसमें से एक भी पहिया कमजोर होगा, तो  गाड़ी विकास पथ पर ठीक तरह से नहीं दौड़ पाएगी। इसका भान हर देशवाशी को रखना होगा और उस पर कहीं भी कोई अत्याचार या उत्पीड़न हो रहा हो, तो उसका खुला और मुखर विरोध करना होगा और यह कैसे रुके इसके लिए वांछित सामाजिक या वैधानिक मार्ग अपनाना होगा, तभी बात बनेगी।
शुरू से ही हर परिवार के मुखिया को हर वह सहूलियत सुविधा अपनी बेटी को भी देनी चाहिए, जो वह अपने बेटे को देता है। भेदभाव की बात यदि हर परिवार खात्मा कर दे, तो  आगे आने वाले कई समस्याएं अपने आप खत्म हो जाएंगी, तो आइए जो कुछ गड़बड़ियां बाकी हैं, उन्हें भी मिटाने में लग जाएं।

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