वामपंथ की टेढी राह

एक जमाने में देश में राजनीत की दिशा तय करने की ताकत रखने वाले वाम दल आज अपने अस्तित्व का संकट झेल रहे हैं और देश में बचे एकमात्र जर्जर किले केरल को बचाने  के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। पहले से ही वहां सत्ता के लिए जो संघर्ष था, उसमें एक बार कांगे्रस नीत गठबंधन को और एक बार वामदलों को मौका मिलता था, परंतु  मोदी और शाह युग में भाजपा का देशव्यापी उठाव जो देश के निर्णायक हिस्से को भगवे रंग में रंगने में कामयाब हुआ, अब कांग्रेस और माकपा दोनों को केरल में सचेत कर रहा है,  प.बंगाल का किला पहले ही ढह चुका है और ममता के सामने वामदलों को अपने उखड़े पाव न खड़े करने तक का मौका नहीं मिल रहा है। त्रिपुरा में अब कोई नाम लेवा नहीं है और  केरल में भी भाजपा आक्रामक है। आखिर €या हुआ, जो तमाम सकारात्मक योगदानों के बावजूद ये दल दम तोड़ते नजर आ रहे हैं और नई पीढ़ी का जुड़ाव इनकी ओर बिलकुल नहीं  है। एक जमाने में कम्युनिस्ट कहलाना जितनी वैचारिक प्रतिबद्धता की बात थी, उतना ही फैशन था, जबकि आज एकदम उसका उलटा दृष्टिगोचर हो रहा है। एक जमाने में सर्वहारा  के कल्याण का प्रतीक, दबे कुचलों की आवाज, शोषित पीड़ित और वंचितों के लिए सब कुछ करने को तैयार ,मजदूरों, मजलूमों की तारणहार, कदाचार विरोधी, सादा जीवन उच्च  विचारवाले कार्यकर्ताओं के प्रतीक वाला यह आंदोलन या विचारधारा अब €यों आकर्षक नहीं है। यह एक बड़ा प्रश्न है। जिस पर इनके नेताओं को सोचना चाहिए। एक दौर ऐसा था कि  जब वामदलों का प्रधानमंत्री सत्तासीन हो सकता था, परंतु पोलितŽयूरो ने नहीं होने दिया, उसके बाद जो घसरण शुरू हुई वह रुकने का नाम नहीं ले रहा है और नेताओं के प्रयास भी  उसे नहीं रोक पार रहे हैं, जो बात सबसे बड़ी समझ में आती है कि सिद्धांत रूप में जिस उदात्त समाज व्यवस्था का प्रारूप इन दलों ने अपने आंदोलानकाल में जनता के सामने रखा,  सत्तासीन होने पर उसे यथार्थ में नहीं परिणत कर सके। शोषित पीड़ित तबके के कल्याण के साथ-साथ विकास की जो दिशा और दशा इनके शासन में जनता को अपेक्षित थी, वह  नहीं हो पाई और वह चाहे भ्रष्टाचार की बात हो, राज्य के चौमुखी विकास की बात हो, उसमें ऐसा प्रदर्शन नहीं हो पाया जो रोल मॉडल की भूमिका निभा सके और पार्टी को विस्तार  दे सके। मा€र्सवाद बहुत अच्छा विचार है। उसके द्वारा मानवता का बहुत कल्याण हुआ, परंतु वह टिक नहीं पाया। कारण जिस आदर्श समाज की उसमें परिकल्पना था, उसे समग्रता  में लागू करना असंभव था, परंतु कुछ चीजें उसमें बहुत अच्छी थीं। चीन को छोड़कर पूरी दुनिया में उसका अता-पता नहीं है और चीन ने एक ऐसा मॉडल विकसित किया, जो अपने  आप में अनूठा है। इसके बाद भी उसे दि€कतें आ रही हैं, तो हमारे यहां कैसे टिक सकता है। अब इन्हें भी पहले सिद्धांतवाद पर जोर न देकर कार्यरूप से कुछ ऐसा करके दिखाना  होगा, जो विकासोन्नमुख हो, सर्वसमावेशक हो और शोषित वर्ग को राहत देने वाला हो। ऐसा करने में प्रतियोगिता बहुत है और उसका मुकाबला पुरातन तौर - तरीकों से नहीं हो  सकता और माकपा इस तरीकों को नहीं छोड़ रही है और इसीलिए घसरण भी तेज है। राष्ट्र स्तर पर उसकी और कई अन्य दलों के साथ राजनीति में कोई फर्क नहीं है, परंतु राज्यस्तर पर वही जब उसके प्रतिद्वंदी के रूप से सामने आए हैं, तो टकराव हो जाता है और यही हो रहा है। कारण ट€कर में टिके रहने के लिए वह वही हथकंडे अपनाती नजर  आती है, जो अन्य दल करते हैं, तो फिर उसमें फर्क कहां रह गया। दिल्ली में उसके नेता कांग्रेस के साथ गलबहियां डाले घूमते है, जबकि बंगाल, केरल में दोनों में मारकाट मची  रहती है। अब राहुल के केरल की वायनाड सीट से चुनाव लड़ने से माहौल और तल्ख होना स्वाभाविक है। कारण वहां भाजपा आक्रामक है और अपना जनाधार बढ़ाने को लेकर काफी  गंभीर है और कांग्रेस अपना जनाधार बरकरार रखने को प्राणपण लगा रही है, ऐसे में उसके कान खड़ा होना स्वाभाविक है। कारण उसमें और कांग्रेस में जो बंटवारा था, उसमें भाजपा  आ रही है और उसका और कांग्रेस का मतदाता वर्ग भाजपा के सामने एक जैसा लगता है और छोटे को बड़ा काटता है, इस सिद्धांत के तहत माकपा जो अब एक राज्य में ही है, पर  खतरा ज्यादा है। परिणामत: उसकी राह टेडी हो गई है। अब देखा यह है कि वह अपना बचा किला बचा पाती है या नहीं।

Post a Comment

[blogger]

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget