एक अच्छी शुरुआत: कम से कम पछतावा तो हो रहा है

एक शतक पहले पंजाब के जलियावाला में, जो कुछ हुआ था उससे देश ही नहीं दुनिया का दिल दहल गया था। वैसे तो ब्रिटिश राज की ज्यादातियों की, उसके अत्याचारों की, उसके हर तरह से देश के शोषण की श्रृंखला अंतहीन है, परंतु जिस तरह से यहां 400 से ज्यादा देशवासियों को मौत की नींद सुला दिया गया और दो हजार से ज्यादा लोग घायल हुए। वे  सब निहत्थे थी और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रख रहे थे, उनके साथ ऐसा क्रूर व्यवहार कोई नरपिशाच ही कर सकता है। इस घटना की खून के छीटें आज भी वहां की दीवारों पर  विद्यमान हैं और जो कुछ वहां हुआ, उसकी बानगी लगभग एक शतक से वहां आने वालों को दिखा रहा है, जिस घटना की क्रूरता सुनकर आज भी रोम-रोम सिहर उठता हो, उसे  अंजाम देने वाले को छोड़ दिया गया। यह उसकी दूसरी सबसे बड़ी शोकांतिका रही है। यह अलग बात है कि वह अपने काले कारनामों से इतिहास में अपना और ब्रिटिश साम्राज्यवाद  दोनों का नाम काला कर गया। जनरल डायर भी अंतत: एक भारतीय की ही गोली का शिकार हुआ। सत्ता की लालच में, उसके मद में हुकुमरान कैसे-कैसे पापों की अनदेखी करते हैं।  घटना के बाद डायर की सुनवाई और उसका छूट जाना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उस समय भी ब्रिटेन अपनी सरजमी पर कानून का राज मानवाधिकार और न जाने ख्या-ख्या बाते करता था और उसके द्वारा जबरदस्ती कब्जाई जमीनों पर रोज शासन के अत्याचारों की एक नई इबारत लिखी जाती थी। उसने हमारे साधनों की, हमारी संपत्ति की कैसे लूट मचाई,  इसका बहुत अच्छी तरह और बारीक खुलासा अमर स्वतंत्रता सेनानी दादा भाई नौरोजी ने अपनी ड्रन थ्योरी में दर्ज किया है, जो आज भी जबकि हमारी आजादी को 75 साल होने को  हैं, दिमाग को सुन्न करने के लिए काफी हैं।
अच्छा है जलियावाला पर पहले ब्रिटेन की महारानी ने कुछ कहा, बाद में प्रधानमंत्री कामेरून ने इसे बेहद शर्मनाक कर दिया और अब घटना की घड़ी पूरी होने के तीन दिन पहले  प्रधानमंत्री टेरीजा इस पर अफसोस जताते हुए इसे एक शर्मनाक धाबा करार दिया है, उचित तो यह होता कि वह इसके लिए सीधे माफी मांगती, जैसे कि वहां का विपक्ष भी मांग कर  रहा है। खैर तब भी इसकी आलोचना का, इसे स्वीकार करने का, जो सिलसिला चल रहा है, वह भी एक अच्छी शुरुआत है। वो भी अपने पापों का प्रायश्चित व्यक्ति हो या राष्ट्र उसे  करना पड़ता है। हमारे यहां कहा भी गया है कि व्यक्ति को अपने अच्छे बूरे कर्मों का जवाब देना पड़ता है। इंग्लैंड देश से ही सही दुरुस्त आ रहा है। धीरेधीरे माफी मांगने की दिशा  में भी गाड़ी बढ़ सकती है, यह घटना और जिस रोलेट एक्ट के विरोध में यह सभा आयोजित थी, एक ऐसे देशव्यापी विरोध का कारण बना। जिसने ब्रिटिश राज की देश में चूलें हिला  दीं और देश के राजनैतिक क्षितिज पर एक ऐसे नेता मोहनदास करम चंद गांधी का उदय हुआ, जिसने आने वाले 28 सालों में अंग्रेजों को देश छोड़ने को बाध्य किया। आइए हम भी  उन शहीदों की स्मृति को श्रधा सुमन अर्पित करते हुए देश को हर तरह मजबूत करने का संकल्प लें, जिससे देश को जो दिन गुलामी के काल में देखने पड़े, वैसे फिर कभी भी न हों और न ही वैसे अत्याचारों का मूक दर्शक बनने को बाध्य होना पड़े। यह कम नहीं है कि आज हम उसे ब्रिटेन को अर्थव्यवस्था के मामले में, पीछे छोड़ने की दिशा में काफी तेज गति  से आगे बढ़ रहे हैं और यह हमारी धमक है कि उसे अतीत के अपने कुकर्मों के लिए पछताना पड़ रहा है, जिसके राज्य में एक जमाने में सूर्य नहीं डूबता था। आज उसका एक  पुराना उपनिवेश उससे आगे जा रहा है और लगतार आगे जा रहा है। यह कमाल है हमारे एकजुटता का, हमारी नीति और नेतृत्व का और यह सबसे बड़ा न्याय है विधाता का।  दुनिया में कोई कितना बड़ा हो यदि वह गलत है, तो उसका अंत होना ही है, भले देर से हो।

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