कारवाई जरूरी

चुनाव जीतने के लिए हमारे यहां कुछ भी करने या बोल जाने का चलन है। लोग इसके लिए बड़ा से बड़ा पातक कर गुजर जाते हैं और इसके बाद भी देश के नेता बने रहते हैं।  उनके लिए जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद और न जाने कितने वादों का प्रयोग दल और प्रत्याशी करते हैं, परंतु जम्मू- कश्मीर में दोनों बड़े दलों के नेता यानी पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस के नेता जिस तरह बोल रहे है। वह तो एक तरह से हमारी एकता और अखंडता पर ही सवालिया निशाना खड़ा कर रहे हैं। महबूबा तो अपनी इस ब्रांड की राजनीति के लिए  पहले से ही जानी जाती हैं, जिसमें वे कभी पाकिस्तान परस्ती की सुर अलापती रहती हैं, तो कभी उनका प्रेम आतंकी परिवारों और पत्थरबाजों के लिए छलकने लगता है और अब  दूसरे नेता उमर को देश में दो-दो प्रधानमंत्री की जरूरत महसूस हो रही है। ऐसी शैलियों की, वक्तव्यों की देश भर में निंदा हो रही है, लोग आवाक हैं कि एक जिम्मेदार नेता ऐसा  कैसे बोल सकते हैं, परंतु प्रधानमंत्री को छोड़कर अन्य किसी भी दल के जिम्मेदार नेता ने इसका विरोध नहीं किया। आखिर चुनाव जीतना ही सब कुछ है, उसके नाम पर देश  विरोधियों जैसी बात करो, देश के दुश्मन की वकालत करो, अलगाववादियों और आतंकवादियों से संवेदना व्यक्त करते नजर आओ, सब नजरअंदाज किया जाए। यदि ये दोनों दल  सही तरीके से काम किए होते और राज्य का सही अर्थों में विकास हुआ होता, तो शायद जो हालात जम्मू-कश्मीर में इतने बिगड़े हैं, कभी न बिगड़ते वहां के वे पंडित भूमि पुत्र भी  उसी तरह अमन चैन से रह रहे होते। जैसी वहां के जिसे महबूबा बहुसं यक कहती है वे अल्पसं यक रह रहे हैं, उनके लिए तो कभी इन नेताओं का दर्द नहीं छलकता और  लोकप्रियता की, जनसमर्थन के हालत यह है कि बिना सुरक्षा के एक कदम भी नहीं चल सकते और राज्य में कुछ भी स ही होने पर अपनी राजनैतिक दुकान चलाने के लिए और  सत्ता की मलाई खाने के लिए यह कुछ भी करने को उतारू हो जाते हैं और पूरा देश सिर्फ भाजपा को छोड़ इसे सुनता है और चुप रहता है। यह एक ऐसी विडंबना है, जिस पर देश  ने नीतिनियंताओं और कानून व्यवस्था की जिम्मेदार लोगों को सोचना जरूरी है। बोलने की स्वतंत्रता है, होनी भी चाहिए, परंतु उसकी भी संविधान में मर्यादाएं हैं। हमारे यहां यदि  उसके नाम पर कुछ लोगों का काम सिर्फ गलतफहमी फैलाना है, ऊट-पटांग बोलकर माहौल खराब करना है। येन, केन, प्रकारेण सत्ता हथियाना है और फिर सुरक्षा में बैठकर मलाई  काटना है, तो ऐसी प्रवृति पर कैसी रोक लगे इस बारे में भी सोचने का समय है।
यह कैसे नेता हैं, जो समग्र कश्मीर में घूम-घूम कर कोई ऐसा आंदोलन नहीं खड़ा कर सकें, जो सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को वहां शांति को, स्थिति सामान्य करने में सहयोग दे  सकें। ये तो अपने वक्तव्यों से मामले को और उलझा रहे हैं। इससे शत्रु खुश हो रहा है। गुमराह तत्वों का मनोबल बढ़ता है, ऐसे मुद्दों पर राजनीति न करके प्रधानमंत्री मोदी की तरह  ही दहाड़ने की जरूरत है। कारण सत्ता की मलाई के लिए कुछ भी करने को अभ्यस्त ये स्वनामधन्य नेता जो राज्य में शांति और समरसता बहाल करने में, भूमिपुत्र पंडितों को  उनका घर बार वापस दिलाने में सत्ता में रहते हुए और उसके बाहर दोनों अवसरों पर विफल रहा है। जनता और सरकार दोनों को इनकी असली जगह दिखानी चाहिए। परिवारवाद  के नाम पर चल रही ये दुकानें, जो सिर्फ विघटन और भ्रम फैला रही हैं, पर लगाम लगानी चाहिए और देश के प्रजातंत्र के असली मालिक यानी जनता जनार्दन को भी अपना मतदान  करते समय ऐसे विघातक और संविधान विरोधी विधान करने वालों को अपने मत से वंचित करना चाहिए। जब नकारात्मक प्रचारों से इन्हें से सत्ता नहीं मिलेगी, तो ऐसे तत्व अपने  आप तिमिर तिरोहित हो जाएंगे। कारण ऐसे विधान बंद होने चाहिए और ऐसा करने वालों पर सख्त कार्रवाई भी होनी चाहिए।

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