अंतर्विरोध और अंतर्द्वंद्व से जूझ रही कांग्रेस और राकांपा

राजनीतिक दलों में मतभेद होना स्वाभाविक है, परंतु वह मनभेद में तŽदील हो जाए, ऐसा कम होता है। चुनावी बयार के बहते ही एक दूसरे के साथी समविचारी दल सारा मतभेद  भूलकर पूरे प्राण पण से उसे जीतने में जुट जाते हैं। अब तक महाराष्ट्र में भी यही होता था। शिवसेना और भाजपा नीत युति राज्य की राजनीति का एक ध्रुव है, जबकि कांग्रेस- राकांपा, आघाड़ी राज्य की राजनीति का दूसरा ध्रुव है। चुनाव शुरू होते ही शिवसेना-भाजपा ने अपने मित्र दलों के साथ महायुति बनाकर आज इस तरह कार्य करना शुरू किया है कि  जैसे उनमें कोई कडुवाहट थी ही नहीं। संक्षेप में शिवसेना और भाजपा ने राज्य में उसी सदाशयता का परिचय दिया है, जिसके चलते वह राज्य में या यूं कहें देश में साथ चलने का  कीर्तिमान बना रहे हैं। हिचकोलें आते हैं, परंतु वे अवरोध नहीं बनते, जबकि कांग्रेस और रांकापा अभी भी अपने अंतर्द्वंद्वों से जूझ रहे हैं। दोनों ही पार्टियों में ऐसी भगदड़ मची है  कि वह थमने का नाम नहीं ले रही है। राकांपा प्रमुख शरद पवार के परिवार से लेकर संगठन तक समस्याएं खड़ी हो रही हैं। कई दिग्गज पार्टी को टाटा कर चुके हैं और कई कतारबद्ध हैं। यदि चुनाव परिणाम भी वैसे ही आए जैसी अपेक्षित है, तो पार्टी का बंटाधार तय है। वैसे भी रांकापा की पकड़ सर्वाधिक पश्चिम महाराष्ट्र में है। कांग्रेस तो कामोबेश पूरे  राज्य में थी, रांकापा का ज्यादा वजूद पश्चिम महाराष्ट्र और मुंबई को छोड़ कोकण में था, जहां पिछले चुनाव में उसे करारी शिकस्त मिली है और इस बार तो वह अस्तित्व बचाने  की लड़ाई लड़ रही है। परिवार ने ऐसा पेच खड़ा किया कि पवार को खुद चुनाव लड़ने से अपना नाम वापस लेना पड़ा। रही बात कांग्रेस की, तो उसने राकांपा से बातचीत में ऐसा  गठबंधन किया कि राज्य में उसकी विपक्ष के नेता के पुत्र ही भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं और उनके भी भाजपा में जाने की चर्चाएं रोज हो रही है, इसके बाद टिकट  वितरण में, जो गड़बड़ियां हुई, उसके चलते भी कई नेता या तो चुप बैठ गए हैं या भाजपा का दामन पकड़ लिए हैं और जाते-जाते अपने जिला मुख्यालय से कुर्सी तक उठा ले गए  हैं। हालत इतने खराब हैं कि मनसे जैसी पार्टी जो ठाणे और मुंबई के मतदाताओं के वर्ग में काफी अलोकप्रिय है। उसकी बैशाखी के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश हो  रही है और तो और एक-दूसरे पर भीतरघात के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। अब जबकि मतदान में गिनती के दिन शेष बचे हैं। अभी भी आया राम-गया राम का सिलसिला थमा  नहीं है। भीतरघात का आरोप लगने शुरू हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम €या होंगे? यह अपने आप स्पष्ट हो रहा है ये दोनों बड़े दल किस दम पर सेना भाजपा और अन्य दलों की  महायुति को पटखनी देने का सपना देख रहे हैं। सिर्फ भाषण और आरोप-प्रत्यारोप काफी नहीं होते, इसके लिए संगठन और एकजुटता की दरकार होती है, जो आघाड़ी में अभी तक  नहीं दिख रहा है। खुद नहीं सोच सकते, तो कम से कम महायुति से ही कुछ सीख ले लेते। कांग्रेस और राकांपा हर चुनाव के छह महीन पहले तैयारी में लगती है, परंतु जिस तरह  का रोष टिकट बंटवारे को लेकर दोनों दलों में दिख रहा है, उससे साफ है कि या तो तैयारी अधूरी थी या दोनों दलों के आकाओं ने उस पर ध्यान नहीं दिया। परिणामत: स्थिति काफी  भ्रमात्मक है। जहां से रोज बड़े-बड़े नेता पार्टी छोड़ रहे हों, उनके कार्यकर्ताओं का मनोबल €या होगा? यह अपने आप पता चल जाता है। ऐसे में इनका €या होगा, यह तो परिणाम ही बताएंगे, परंतु फिलहाल संकेत सच्चे नहीं है।

Post a Comment

[blogger]

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget