नवरात्रि के पहला दिन होती है देवी मां शैलपुत्री की पूजा

नवरात्रि का पहला दिन देवी मां शैलपुत्री की पूजा करने के लिए समर्पित है, जिन्हें शैलपुत्री भी कहा जाता है। जिन्हें शास्त्रों में पर्वतों की बेटी के रूप में वर्णित किया गया है। शŽद  शिला का अर्थ है चट्टान या पहाड़ और दूसरी आधी पुत्री का अर्थ है बेटी। शैलपुत्री को करोड़ों सूर्यों और चन्द्रमाओं की तरह कहा जाता है। वह एक बैल (नंदी) पर सवार होती है और  अपने हाथों में त्रिशूल और कमल धारण करती हैं। वह अपने माथे पर एक चांद पहनती है। हिंदु मान्यता में इसका विशेष महत्व है। नवरात्रि में शैलपुत्री पूजन का बेहद अधिक महत्व  है। हिंदु मान्यता के मुताबिक मां शैलपुत्री की पूजा करने से मूलाधार चक्र जाग्रत हो जाता है, जो भी भ€त सच्ची श्रद्धा भाव से मां शैलपुत्री का पूजन करता है। उसे सुख और सिद्धि की  प्राप्ति होती है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने इस दौरान सभी देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त  करने के लिए निमंत्रित किया, लेकिन उन्होंने भगवान शंकरजी को इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं भेजा। जब सती ने सुना कि उनके पिता एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, इसके बाद उनका मन व्याकुल हो उठा। उन्होंने अपनी यह इच्छा शंकरजी को बताई। सब बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि प्रजापति दक्ष किसी वजह से  हमसे नाराज हैं। उन्होंने अपने यज्ञ में सारे देवताओं को निमंत्रित भेजा। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, लेकिन उन्होंने हमें नहीं बुलाया। इस बारे में कोई सूचना तक नहीं  भेजी। ऐसी स्थिति में तु्हारा वहां जाना ठीक नहीं होगा। भगवान शंकरजी के समझाने का खास असर सती पर नहीं हुआ। अपने पिता का यज्ञ देखने और अपनी माता और बहनों से  मिलने की उनकी उनकी इच्छा कम नहीं हुई। जब भगवान शंकरजी ने देखा कि उनके समझाने के बाद भी सती पर इस बात का कोई असर नहीं हो रहा है तो उन्होंने उन्हें वहां जाने  की इजाजत दी। जब सती अपने पिता के घर पहुंचीं और उन्होंने वहां देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। सभी लोग मुंह फेरे हुए हैं। केवल उनकी  माता ने ही उन्हें प्यार से गले लगाया। उन्होंने देखा कि बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास अधिक था। अपने घरवालों के इस बर्ताव को देखकर उन्हें बहुत ठेस पहुंची। इतना ही  नहीं उन्होंने यह भी देखा कि वहां चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। साथ ही दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती बेहद गुस्से में आ गईं। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहां आकर गलती कर दी है। यह सब वह बर्दाश नहीं कर सकीं और वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न पाईं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। जब भगवान शंकर को यह पता चला उन्होंने अपने गणों को भेजकर  दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णत: विध्वंस करा दिया। फिर सती ने अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया और वह शैलपुत्री कहलाई।

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