यह खतरे की घंटी

राज्य में चुनावी माहौल धीरे-धीरे जोर पकड़ रहा है। इस दौरान एक ऐसी घटना प्रकाश में आई है, जिसे लेकर सभी देशवासियों के कान खड़े होना स्वाभाविक ही नहीं अनिवार्य है।  एक जगह कार्यक्रम चल रहा था। लोगों की भीड़ थी। देखते ही देखते वहां से भीड़ गायब हो गई। यह इसलिए नहीं हुआ कि किसी ने कोई साजिश की, बल्कि यह इसलिए हुआ कि  भीड़ में से अचानक एक बालक ने जोर से आवाज लगाई कि पानी आ गया है। पानी की कमी झेल रहे उस इलाके की जनता के लिए यह यह सूचना जंगले में लगी आग की सूचना  से ज्यादा बड़ी बात थी, इसलिए सब छोड़कर वे पानी भरने चल दिए अभी गर्मी की शुरुआत है और ऐसे समय में ऐसी हैरतंगेज घटना का सामने आना हमारी आंखे खोलने के लिए  काफी होनी चाहिए। अभी समय है कि हम प्राकृतिक आसन्न समस्याओं को कैसे मात दे सकते हैं इस दिशा में निर्णायक कदम उठाएं और उस भविष्यवाणी को चरितार्थ होने से रोंके  कि एक दिन ऐसा आएगा, जब पानी के लिए युद्ध होंगा, जो कुछ आसार इस घटना से दिख रहे हैं वह ठीक नहीं है। यह हाल उस देश की है, जहां का एक बड़ा हिस्सा हर वर्ष बाढ़  से डूबता है। पानी की कमी उन इलाकों में भी हो रही है या उसका स्तर नीचे जा रहा है, जहां भरपूर पानी बरसता है।
अब लोग कुछ भी छोड़ कर पहले पानी लेने जा रहे हैं। कारण फिर कब पानी आएगा उन्हें पता नहीं, यह काफी खतरनाक संकेत है। गाड़ी उसी दिशा में जा रही है, जिस ओर  पर्यावरण और प्रकृति की हो रही अधाधुंध संदोहन के चलते चेतावनी दशकों से देते आ रहे है। कम से कम जब वे चेतावनियां कमोबेश यथार्थ में परिवर्तित हो रही हैं, तब तो हमें  सावधान हो जाना चाहिए और उसे कम करने और धीरे-धीरे इस समस्या का समाधान करने को ओर कदम बढ़ाना चाहिए। कारण जो यह आवश्यकता हो रही है, इसके कारण भी  मानवनिर्मित है।
हमने अपने स्वार्थ में, लालच में, हमारे पूर्वजों की उस सीख की, अनदेखी की कि प्राकृतिक संसाधनों का उतना ही संदोहन हो, जितना जीवन यापन के लिए जरूरी हो। देश में जहां  भी आप तीन दशक पहले गए होंगे, जिन नदियों में बरहोमास पानी रहता था, वे अब बारिश के बाद ही सुखने लगती है और उनके किनारे जो पेड़ होते थे, सघन जंगल होते थे, आज  या तो बीरान हैं या सिर्फ झाड़ और झंखाड़ हैं। इनकी जड़ें पानी सोखती थीं और बाद में उसके चलते ये नदिया वर्ष भर जल से भरी रहती थीं। इसलिए पर्यावरण के क्षेत्र में कार्यरत  विशेषज्ञ और कार्यकर्ता वृक्षारोपण को बड़े पैमाने पर अपनाए जाने की वकालत कर रहे हैं। साथ ही सिंचाई के, देशी खड़ा बनाने की उन परमपरागत तौर तरीकों को जीवित करने की  बात कर रहे हैं, जिससे तालाबों और कुएं की जो अनदेखी पंपिंगसेट , बोरवेल और हैंडपंप के दौर में हो रही है और इन सबके चलते पानी का जो अपव्यय और दुरुपयोग हो रहा है  वह थमे, नहीं तो अभी थोड़ा सा हिस्सा पानी की मार झेल रहा है। इसका दायरा बढ़ने में देर नहीं लगेगी। पानी इस धरती के जन जीवन के लिए कितना जरूरी है। यह बताने की  जरूरत नहीं है। आवश्कता है उसे बचाने की और इसके लिए हर व्यक्ति को कार्यरत होने की जरूरत है। सरकारें प्रयत्नशील है ,स्वयंसेवी संगठन हर तरह से सक्रिय हैं। आवश्यकता  जन-जन के कार्यरत होने की है। कारण यह समस्या हर व्यक्ति की है। कारण पानी से ही जनजीवन है। जलचर, नभचर, थलचर प्राणीजगत, वनस्पति सबके लिए यह अनिवार्य है,  नहीं तो उ€तघटना से भी स्थिति ज्यादा खतरनाक होगी और भविष्य में वह ऐसा विद्रूप रूप अख्तियार कर सकती है, जिसका समाधान असंभव होगा, अभी भी समय है, अभी खतरे  की घंटी बजा रही है। अभी सब मिलकर इस खतरे को दूर करने की उपायों पर काम करेंगें, तो खतरा अवश्य दूर होगा नहीं, तो एक नई झंझट सामने आने से कोई रोक नहीं सकता।  हम इसके जिम्मेदार हैं और हमें ही मार्ग ढूढ़ना होगा।

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