अपने ही विरोधाभाषों की शिकार है सपा-बसपा और कांग्रेस

सपा-बसपा और कांग्रेस का गठबंधन का प्रयास बहुत पहले ही सुपर फ्लॉप हो चुका है और जिस तरह इनमें तू बड़ा कि मैं बड़ा की प्रतिस्पर्धा मची हुई है, उसके मद्देनजर इन सबका  सूपड़ा साफ होना तय लग रहा है। पहले इन्होंने कांग्रेस को साथ न लेकर अलग से गठबंधन कर लिया, इस अपमान से तिलमिलाई कांग्रेस ने अपने तुरुप का पत्ता चलते हुए  प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश के समर में उतार दिया और वहां की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। अब जिस तरह वह टिकट बांट रही  है, उसमें अपने जीतने की बजाय सपा-बसपा गठजोड़ को परात्तूत करने का मकसद ज्यादा दिख रहा है और दूसरी ओर से भाजपा भी इन तीनों को छकाने का कोई मौका नहीं छोड़  रही है और इनके अंतर्द्वंद्वों और विरोधाभाषों को गिन-गिन कर जनता के सामने रख रही है।
इससे नि:संदेह उत्तर प्रदेश में भाजपा का मनोबल उठाव पर है। एक जमाने की राज्यव्यापी पार्टियां सपा और बसपा अपने कार्यकर्ताओं के व्यापक असंतोष से भी दो चार हो रही हैं।  कारण इस गठजोड़ ने आधी-आधी सीटों पर कार्यकर्ताओं की आशाओं पर तुषारापात कर दिया है। एक और बात जो इन दलों के अगेंस्ट जा रही है, वह है इन तीनों में एक ही  मतबैंक को लेकर लॉग- डॉट है, जो इनके एक साथ आने में सबसे बड़ा रोड़ा है। कारण यह सीधे इनके अस्तित्व से जुड़ा है। भाजपा एक कैडर आधारित पार्टी है, उसका मतबैंक इन्टैक्ट है, जबकि सपा, बसपा, कांग्रेस के खिसकते जनाधार को अपनाकर और उस पर जातिवाद का मुलत्ता चढ़ाकर राज्य में अपना आधार बनाए हैं। अब यदि वह कहीं कांग्रेस  की ओर खिसक गया, तो फिर उनका क्या होगा? यह और उन्हें कांग्रेस से दूरी बनाए रखने के लिए मजबूर करता है और भाजपा का डर उन्हें जीने नहीं दे रहा है। कारण पिछले दो  चुनावों में अलग-अलग लड़कर और भाजपा से बुरी तरह पिट कर उन्होंने सबक लिया है और वह सब कुछ भुलाकर दोस्त बन गए हैं, परंतु भाजपा अपनी पुरानी सफलता न दुहरा  सके और कांग्रेस राज्य में अपना खोया जनाधार न वापस पा सके। यह जो उनका लक्ष्य है वही उनका खेल खराब कर रहा है। कारण भाजपा तो उन्हें पराभूत करने के लिए अपने राजनैतिक तरकश का हर तीर चला ही रही है। कांग्रेस भी उनके इलाके में मजबूत प्रत्याशी खड़ा करके इनकी मिट्टी को पलीद करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रही है। ये कई सीटों  पर यह ही नहीं समझ पा रहे हैं कि उम्मीदवार किसे बनाएं और निरहुआ जैसे लोकप्रिय उम्मीदवार देकर भाजपा अखिलेश को आजमगढ़ में ज्यादा समय बिताने को मजबूर कर रही  है। कुल मिलाकर सपा-भाजपा और बसपा के साथ आने के बाद भी जैसी उन्हें उम्मीद थी, वैसी अनुकूल स्थिति नहीं लग रही है। कारण भाजपा  अपना इतिहास दोहाराने के लिए  दमखम लगाई है, जबकि कांग्रेस अपना खोया आधार पाने का प्रयास कर रही है। जबकि सपा- बसपा राज्य की आधी-आधी सीटों पर अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी झेल रही है और  सपा तो परिवार की ओर से शिवपाल के रूप में लगातार चुनौती झेल रही है। ऐसे परिदृश्य में इन दोनों दलों के लिए इनके विरोधाभाष ही इनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इस पर  ये आधार पाते हैं या नहीं यह लोकसभा चुनाव तय करेगा। यह उनकी अग्नि परीक्षा है। या तो इनका अस्तित्व बचेगा या जाएगा। वैसे भी डरकर या मन में राम और बगल में छुरी  रखकर उठाया गया कोई भी कदम सही नहीं होता है। सपा-बसपा, भाजपा-कांग्रेस दोनों को बराबर दूरी पर रखने की जो रणनीति ये अपना रही है। वह उन्हें ऐसे दोराहे पर खड़ा कर  रहा है, जहां से उनकी गाड़ी का रुख या तो रसातल में जा सकता है या उन्हें उठा भी सकता है। वैसे भी जाति और व्यक्तिआधारित दलों की उम्र कम ही होती है।

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