'दिवाला कानून का मकसद बकाए की वसूली नहीं, बल्कि कंपनियों का पुनर्गठन’

नई दिल्ली
भारतीय दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के चेयरमैन एमएस साहू ने कहा कि दिवाला कानून का मकसद भुगतान करने में अक्षमता के संकट से जूझ रही  कंपनियों का समाधान और उनका पुनर्गठन करना है। यदि कर्जदाता एक के बाद एक अथवा एक साथ अपने बकाए की वसूली करने लगेंगे, तो कंपनी समाप्त हो जाएगी। उल्लेखनीय है कि दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के अमल में आने के बाद से भुगतान नहीं कर पाने वाली कई कंपनियों से काफी राशि वसूल कर ली गई है। आईबीसी कानून के तहत ऐसी कंपनियों से बकाए की वसूली और उनके संकट के समाधान के लिए बाजार के अनुरूप और समयबद्ध प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है। साहू ने इस पर भी  गौर किया कि इस संहिता में बकाए की वसूली को खारिज नहीं किया गया है, लेकिन यह सब कंपनी के पुनर्गठन के तहत ही होना चाहिए। साहू ने कहा कि बकाए की वसूली कंपनी  के पुनर्गठन के बाद भविष्य की प्राप्तियों से ही होनी चाहिए। अब तक के अनुमानों के मुताबिक आईबीसी के तहत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पांच लाख करोड़ रुपए से अधिक की  वसूली हो चुकी है। इसमें से करीब दो लाख करोड़ रुपए की राशि को तो आईबीसी के तहत समाधान के लिए दर्ज करने से पहले ही वसूल लिया गया, जबकि समाधान योजना के  तहत करीब एक लाख करोड़ रुपए की प्राप्ति हुई है। साहू ने इस बात पर जोर दिया कि यह संहिता अपनी देनदारियों को चुकाने में अक्षम होने वाली कंपनियों के पुनर्गठन और संकट  के समाधान के लिए हैं। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य पुनर्गठन है न कि वसूली। यदि ऋणदाता एक के बाद एक या एक साथ अपने बकाए की वसूली करने लगेंगे तो कंपनी बुरी  तरह धराशाई हो जाएगी और समाप्त हो जाएगी।
साहू ने कहा कि सवाल यह है कि €या वसूली से पुनर्गठन में सुविधा होती है? यदि नहीं तो आईबीसी में इस बारे में विचार नहीं किया गया है। आईबीसी के लागू होने और राष्ट्रीय  कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) की स्थापना के बाद से करीब 12,000 मामले इसमें दर्ज किए गए। इस संहिता के तहत मामलों को न्यायाधिकरण की मंजूरी के बाद से ही  समाधान के लिए लिया जा सकता है।
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