हम कब तक मुफ्ती जैसे को झेलते रहेंगे

पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती जो अब तक आतंक और पाक के मुद्दे पर नरमी के लिए जानी जाती थी, मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे पाक और आतंक के खिलाफ उस तरह नहीं सख्त हो  पाईं जैसी जरूरत थी। देश विरोधी काम करने वाले संगठन की पाबंदी का विरोध यहां तक कि पुलवामा में हमारे जवानों की शहादत जैसे मामले में भी पाक की वकालत जैसा कार्य  करती नजर आईं और अब तो वह सीधे धमकाने पर उतर आई हैं। उनका यह कहना कि यदि सरकार ने अनुच्छेद 370 खत्म किया, तो राज्य के साथ देश का रिश्ता खत्म हो  जाएगा। एक जिम्मेदार नेता द्वारा ऐसा बयान जितना गैर जिम्मेदराना है, उतना ही हैरतंगेज भी। यह उस समय और आपत्तिजनक हो जाता है, जब कहीं भी ऐसी कोई बात नहीं हो  रही है। वे और उनकी पार्टी जम्मू-कश्मीर की अलगावाद की समस्या जिस तरह देखती है और जिस तरह उनकी ऐसे तत्वों के साथ संवेदना और पाक के साथ सहानुभूति के स्वर प्रकट होते रहते हैं। यह भी उ€त नकारात्मक शक्तियों के साथ कठिन समस्या के न हल होने का प्रमुख कारण हैं। लगता है कि चुनावी सफलता हासिल करने के लिए वह कुछ भी  करने को तैयार है, परंतु इस हद तक जाना निहायत आपत्तिजनक है और ऐसे प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने के समान है, जो देश के शत्रु हैं और जिनसे दो-दो हाथ करने में देश को  काफी त्याग बलिदान करना पड़ रहा है। ऐसे लोग जो राजनीति के लिए देश में आतंकवाद और अलगाववाद के प्रतीकों के साथ संवेदना व्यक्त करते नजर आएं या हमदर्दी दिखाएं और देश से संबंध टूटने की बात करने लगें, तो उन पर लगाम लगाना व्यवस्था की जिम्मेदारी बन जाती है। महबूबा के बयान सतत उन्हें उसी दिशा में ले जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर  में अल्पसंख्यक ज्यादा हैं, परंतु जम्मू,घाटी और लद्दाख तीनों क्षेत्रों को मिलाकर अन्य लोगो की आबादी कम नहीं है। महबूबा और उनकी पार्टी की उसके जन्म के ही समय से जो  मोहŽबत अल्पसंख्यकों के लिए दिखी। वह बहुसंख्यकों के लिए नहीं दिखाई दी। उनकी पार्टी ने उनके साथ झूंठी सहानभूति जरूर दिखाई, परंतु चाहे वह वहां से जबरिया निर्वासित और  देश में ही शरणार्थी जीवन जी रहे कश्मीरी पंडितों का सवाल हो या वहां के स्थानीय सिखों का सवाल हो वे और उनकी पार्टी हमेशा उचित ध्यान न दिए जाने का आरोप झेलती रही है  और भाजपा के उनके सरकार से समर्थन खींचने का एक बड़ा कारण था। हमारे यहां राजनीति का स्तर कितना नीचे जा चुका है। सत्ता के लोभ में लोग €या कर सकते हैं, उसकी यह  बानगी है। महबूबा जैसी राजनीति के लिए क्षेत्रवाद, जातिवाद, धर्मवाद सबका दुरुपयोग एक ऐसा खतरनाक रूप अख्तियार बन चुका है, जो समाज को बांट रहा है। महबूबा तो इस   बसे आगे जा रही हैं वह तो आतंक और अलगाववादियों और देश विरोधी गतिविधियों के लिए बंद सगठनों की वकालत करने से भी परहेज नहीं कर रही हैं। अब तो देश के संबंध  खत्म करने की धमकी दे रही है। यह राजनीति नहीं कुनीति है। इस पर उन्हें विचार करना चाहिए कि सत्ता सुख के लिए वे और कितना नीचे गिरेंगी और देश में और जम्मू-कश्मीर  की आवाम को भी इस बारे में गंभीरतापूर्वक सोचना होगा कि ऐसे नेताओं को कितना जनसमर्थन दिया जाए। कारण ऐसे स्वयंसेवी राजनीति करने वाले लोग किसी का भी भला नहीं  कर सकते। ऐसे प्रवृतियों पर अंकुश लगाने के लिए जनता, सरकार और प्रशासन सबको हरकत में आना होगा। वैसे भी व्यक्ति को समाज को बांटने का, देश को धमकाने का  अधिकार नहीं मिल सकता, जो ऐसी करता है, उसे जनता और सरकार दोनों उसकी औकात दिखाए।

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