बिन पानी सब सून.....

कवि रहीम कहते हैं- रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून। रहीम ने श्लेष अलंकार के द्वारा पानी के अर्थ का विभिन्न संदर्भों में प्रयोग  किया है। पर हम पानी का सीधा अभिप्राय पानी से ही लेंगे। जीवन का अनिवार्य तत्व पानी के बिना न मनुष्य का, न जीव-जंतुओं का और न ही प्रकृति का बने रहना संभव है। बड़े- बड़े राष्ट्रवादी दावों के बीच सवाल है कि क्या पानी भी राजनीति का मुद्दा हो सकता है? चूंकि हमारे देश की संसदीय राजनीति में बुनियादी मुद्दों का चलन नहीं है, इसलिए या तो  बुनियादी मुद्दे मुद्दे ही नहीं माने जाते हैं, या इन्हें हास्यास्पद और उपेक्षित माना जाता है, लेकिन क्या ये मुद्दे गैर-जरूरी हैं? दुनिया में तेजी से भूमिगत जल का स्तर खत्म हो रहा है।  वर्ष 2000 से 2010 के बीच वैश्विक भूजल में 22 फीसदी की कमी आई है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा भूमिगत जल का उपयोग करता है और उक्त वर्षों में भारत के भूजल में  23 प्रतिशत की कमी हुई है। यूनिसेफ के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली और बैंग्लोर जैसे महानगर जिस तरह जल संकट का सामना कर रहे हैं, उसे देखते हुए लगता है कि 2030 तक  इन नगरों का भूजल भंडार समाप्त हो जाएगा। वहीं भारत सरकार के नीति आयोग का मानना है कि भारत में 60 करोड़ लोग गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। विश्व  स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनियाभर में नब्बे प्रतिशत बीमारी पानी के कारण ही होती है, क्योंकि लोगों को पीने का शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं होता है। पानी के मामले में ये  आंकड़े हमारे देश की भयावह तस्वीर पेश करते हैं। भारत में गर्मी का मौसम आते ही पानी का संकट विकराल रूप से सामने आ खड़ा हो जाता है। जल स्तर और अधिक नीचे चला  जाता है। नदी, जलाशय, तालाब, कुआं, नलकूप तेजी से सूख जाते हैं। पहले से पानी का समुचित प्रबंधन न होने की वजह से हाहाकार मचना शुरू हो जाता है। टैंकरों के पीछे डब्बा  लेकर दौड़ती परेशान हाल जनता की खबरें अखबारों में छपने लगती हैं। दिनों-दिनों पानी का संकट बढ़ता जा रहा है। अब जहां ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बारिश में कमी हुई है,  वहीं दूसरी ओर बारिश के पानी का समुचित प्रबंधन हमारे यहां नहीं है। इसके साथ ही अनावश्यक खनन ने भूमिगत जल की स्थिति को संकटग्रस्त किया है। बाक्साइट जैसे खनिजों  की विशेषता यह होती है कि यह पानी के जल स्तर को नीचे गिरने से रोकती है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जिस तरह इसकी मांग बढ़ी है, उससे इसका अंधाधुंध खनन हो रहा है।  इस विवेकहीन खनन ने पारिस्थितिकी संकट पैदा किया है। खनन के मामले में पर्यावरण मानकों का ख्याल नहीं रखा जाता है और न ही एनजीटी के निर्देशों का पालन किया जाता  है। शहरों में एनजीटी का निर्देश है कि बिल्डर निर्माण-कार्य में भूमिगत जल का इस्तेमाल नहीं कर सकते, लेकिन धड़ल्ले से इसका उल्लंघन होता है। इन वजहों ने पानी की समस्या  को अधिक बढ़ा दिया है। लातूर, विदर्भ और बुंदेलखंड में पानी संकट की जो भयावह स्थिति है, वह आने वाले दिनों में चारों तरफ फैल सकती है। क्या होगा, जब भूजल का भंडार ही  खत्म हो जाएगा? पानी की समस्या का एक बहुत बड़ा कारण हमारी जीवनशैली और सामाजिक-प्रशासनिक व्यवस्था की गड़बड़ी है। देश में जीवन के बुनियादी संसाधनों का समान  बंटवारा न होने की वजह से इस तरह की समस्या और भी मुसीबत बन जाती है। हमारे देश में वंचित समुदाय और गरीब वर्गों तक जीवन की बुनियादी जरूरतों की पहुंच नहीं है,   उनमें से एक पानी भी है। झुग्गी-झोपड़ियों में गरीब तबकों के लिए पानी जैसी बुनियादी जरूरतों को जुटाना भी बहुत मुश्किल होता है। शासन-प्रशासन और समाज का संपन्न तबका  इन वर्गों की लगातार अनदेखी करता है। इस वजह से वंचित समुदायों और गरीबों के यहां न तो नलकूप की व्यवस्था मिलती है, न ही उन तक ठीक ढंग से पानी की सप्लाई होती  है। हमारी चमक-धमक वाली उपभोक्तावादी जीवनशैली के कारण हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी खत्म हो गई है। कभी राह चलते लोगों के लिए प्याऊ और छायादार ठिकाने की  व्यवस्था होती थी, लेकिन बाजारवादी प्रवृत्ति की वजह से सब खत्म हो गए हैं। जब से पानी भी बेचने की वस्तु बनी है, उसका संकट और अधिक बढ़ गया है, क्योंकि एक तबका  उससे मुनाफा कमाता है। मुनाफे की यह प्रवृत्ति नीति-निर्माण में दखल देती है और यहीं से उसका राजनीतीकरण शुरू हो जाता है। क्या हम आज यह सोच सकते हैं कि पानी के  बेचने पर प्रतिबंध लगे? क्या हम यह मांग कर सकते हैं कि उन सभी प्राकृतिक तत्वों का बाजारीकरण न किया जाए, जिससे मनुष्यों और जीवों का जीवन जुड़ा हुआ है? पैसे वाले  पानी तो क्या तेल भी खरीद सकते हैं, लेकिन जो गरीब हैं, उनका क्या होगा? वनस्पतियां और पशु-पक्षियों का क्या होगा? हमारे जीवन में बहुत-सी समस्याएं मुनाफे और वर्चस्व की  प्रवृत्ति की वजह से खड़ी हुई हैं। क्या हमारी राजनीति जीवन की बुनियादी जरूरतों को मुनाफे और वर्चस्व से मुक्त करने की बात करेगी?

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