आखिरी चरण में है भाजपा का लिटमस टेस्ट

पटना
सातवां यानी आखिरी चरण भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस दौर में जिन आठ संसदीय क्षेत्रों में 19 मई को मतदान होना है, उनमें से चार में केंद्रीय मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव  पर लगी हुई है। पटना साहिब में रविशंकर प्रसाद, आरा में आरके सिंह, बक्सर में अश्विनी कुमार चौबे और पाटलिपुत्र में रामकृपाल यादव। रविशंकर प्रसाद राज्यसभा के सदस्य हैं।  पाटलिपुत्र में राजद ने लालू प्रसाद की पुत्री मीसा भारती को उम्मीदवार बनाया है, जो राज्यसभा की सदस्य हैं। मतदान से यह तय होगा कि ये दोनों लोकसभा के सदस्य बनेंगे या राज्यसभा में ही दिन पूरे करने होंगे।
सातवें चरण में एनडीए में सर्वाधिक पांच उम्मीदवार भाजपा के हैं। रालोसपा के दो और जदयू से एक उम्मीदवार। भाजपा के पांच उम्मीदवारों में से चार केंद्रीय मंत्री हैं। यह चरण  इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अभी अच्छा-खासा कार्यकाल बचे होने के बावजूद राज्यसभा के दो सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचन के जरिए जनप्रतिनिधि बनने के लिए बेताब हैं। पटना  साहिब, पाटलिपुत्र, आरा, बक्सर और सासाराम पर फिलहाल भाजपा का कब्जा है। नालंदा पर जदयू का। जहानाबाद और काराकाट में पिछली बार एनडीए के बैनर तले रालोसपा को  जीत मिली थी। जदयू पिछली बार अपने बूते चुनाव मैदान में था। इस बार वह एनडीए का हिस्सा है। इस बार रालोसपा एनडीए से छिटक कर महागठबंधन में शामिल हो गई है। छह  सीटों पर पुराने लड़ाके ही मैदान में हैं। एक तरफ जीत के रिकॉर्ड को बरकरार रखने के लिए मशक्कत करने वाले, तो दूसरी तरफ पिछली हार का बदला लेने के लिए जूझने वाले।  केवल पटना साहिब और नालंदा के उम्मीदवार पहली बार एक- दूसरे से टकरा रहे। भाजपा ने रालोसपा के हिस्से वाली दोनों सीटें (काराकाट और जहानाबाद) जदयू के हवाले कर दी  है। नालंदा उसका अपना गढ़ है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह जिला होने के कारण यह बेहद प्रतिष्ठित सीट है। निर्वतमान सांसद कौशलेंद्र कुमार यहां से हैट्रिक लगाने के लिए रात-दिन एक किए हुए हैं। काराकाट  में महाबली सिंह जदयू के उम्मीदवार हैं, जो 2009 में यहां के विजयी रहे थे। जहानाबाद में चंदेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी पर पार्टी ने दांव लगा रखा है। यहां कभी विश्व का पहला  विश्वविद्यालय हुआ करता था। इसी कारण इसे ज्ञान की धरती कहते हैं। इसकी नई पहचान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह जिला होना है। मोदी लहर के बावजूद पिछली बार जदयू  के खाते में जो दो सीटें गई थीं, उनमें से एक नालंदा भी है। दूसरी सीट पूर्णिया की रही। नालंदा में इस बार भी कौशलेंद्र कुमार जदयू के उम्मीदवार हैं, जो नीतीश के नाम-काम पर  हैट्रिक लगाने की जुगत में हैं। कभी कम्युनिस्टों की धरती रही जहानाबाद ने आगे चलकर समाजवादियों को भी फलने-फूलने का भरपूर मौका दिया। भाजपा और कांग्रेस पिछले कई  चुनावों से यहां सहयोगी दल की भूमिका में ही हैं। मुख्य मुकाबले में हमेशा क्षेत्रीय दल ही रहे हैं। निवर्तमान सांसद डॉ. अरुण कुमार इस बार राष्ट्रीय समता पार्टी (सेक्युलर) से ताल  ठोक रहे। यह उनकी बनाई पार्टी है, जिसके वे इकलौते उम्मीदवार हैं। कभी कांग्रेस का गढ़ रहे काराकाट पर बाद में समाजवादियों का कब्जा हो गया। पिछले कई चुनावों से यहां  क्षेत्रीय दलों का ही दबदबा देखने को मिल रहा है। देश की दोनों बड़ी पार्टियों (कांग्रेस और भाजपा) की भूमिका यहां सहयोगी दल की बनकर रह गई है।
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