यह कैसी संवेदनहीनता

सैम पित्रोदा एक विद्वान व्यक्ति हैं साथ ही कांग्रेस आला कमान के निष्ठावान सिपाही के रूप में जाने जाते हैं और पार्टी के मुखिया राहुल गांधी पर लगने वाले चुनावी समर के  आरोपों में काफी मुखरता के साथ उनकी सफाई देते हैं, परंतु चौरासी का सिख दंगा और उसमें सिखों को निशाना बनाकर किया गया हमला, जिसमें तमाम सिख भाइयों की जानें गई।  सिख समुदाय के लिए बहुत संवेदनशील है और सत्ता पक्ष उसे चुनावी मौसम में लगातार उठा रहा है। पंजाब एक मात्र ऐसा सूबा है, जहां कांग्रेस काफी मजबूत स्थिति में है और ऐसे  समय में जबकि चुनाव चल रहा है, 'जो हुआ सो हुआ।' जैसा बयान पार्टी का वहां और अन्य राज्यों में जहां सिख समुदाय ज्यादा है, पार्टी का भठ्ठा बिठा सकता है। स्वाभाविक है कि  इस पर कांग्रेस विरोधियों की कौन बात करे, कांग्रेस पार्टी को ही पित्रोदा के बयान से पल्ले झाड़ना पड़ा और स्वयं कांग्रेस प्रमुख को इस पर खेद व्यक्त करना पड़ा। पित्रोदा भी जब  उन्हें गलती का एहसास हुआ माफी मांग रहे हैं, परंतु जो नुकसान होना था हो चुका है। अब यह सारी कार्रवाई नुकसान रोकने के लिए हो रही है। कांग्रेस की समस्या ऐसे वाचाल और  बिना सोचे-विचारे कुछ भी बोल जाने वाले निष्ठावानों से ज्यादा है। इसने पार्टी का बहुत नुकसान किया। कभी अय्यर, कभी सिब्बल और कभी पित्रोदा ऐसा कुछ बोल जाते हैं, जिससे  पार्टी का किया धरा बेकार हो जाता है। इस सूची में थरूर को भी शामिल किया जा सकता है, जिनका और सिद्धू का इमरान प्रेम उस समय उफनता रहता है, जब पूरे देश में उसके  विरोध में लोग पंक्तिबद्ध खड़े हैं और उसकी काली करतूतों से हलाकन उसे हमेशा के लिए सबक सिखाने की बात कर रहते हैं। एक जमाने की देश की सबसे बड़ी पार्टी आज अपने  आपको वोटकटवा कहलाने को इन्हीं कारणों के चलते बाध्य हो रही है। सत्ता ने उन्हें इस कदर अंधा बना दिया है कि उन्हें जन भावना या जनता की नŽज समझ में ही नहीं आ रही  है। यही कारण है कि जिस राज्य से वह जाती है, वापस आने में दशकों लग जाते हैं। आवश्यक है कि कांग्रेस अब चुनाव जीतने की हलचल से ज्यादा अपने नेताओं को उन जन  संवेदनाओं और समस्याओं को और संवेदनशील बनाए, जो लगातार अपने उलटे-सीधे बयानों से उसका बेड़ा गर्क करते रहते हैं। उनके अधिकांश नेताओं ने धर्म निरपेक्षता का मतलब  अल्पसंख्यक परस्ती मान लिया है, जबकि उसका असली मतलब सभी धर्मावलंबियों को अपने क्रिया-कलाप स्वतंत्र रूप से करने की आजादी और सबको समान अधिकार। इसमें किसी  को ज्यादा और किसी को कम तरजीह ने कांग्रेस को ही उसकेबड़े मतदाता वर्ग में संदिग्ध बना दिया है, जिस पर यदि पार्टी को उठना है, तो खुद सोचना होगा। सत्ता हर राजनेता का  लक्ष्य है, परंतु उसके लिए उसे अपने विचारधारा और देश की आवश्यकता पर आधारित एक मॉडल अपने घोषणा पत्र के माध्यम से जनता के सामने खड़ा होना पड़ता है और उस पर  जनता उन्हें चुने, ऐसा विश्वास जनता में जगाना होता है।
कांग्रेस वह करने के बजाय बैसाखियां ढूंढ रही है और उसके कई नेता विचारधारात्मक लड़ाई लड़ने के बजाए अपने प्रतिद्वंदी से पार पाने के लिए कुछ भी बोल रहे हैं, जो  जनसंवेदनाओं के ऊपर तीखा प्रहार की तरह है। कांग्रेस को ऐसी बातों चीजों के बार-बार दोहराए जाने से बचना होगा, नहीं तो उसकी बैशाखियां भी अब उसे एक-एक कर टूट रही हैं  जैसा कि गठबंधन बनाने के उसके प्रयासों का इस बार हुआ है। यदि वह विचारधारा पर अडिग नहीं रही और अपने बड़बोले नेताओं पर लगाम नहीं कसी, तो आगे कीडगर और  कठिन होने की संभावना है।

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