ममता के राज मे .....

एक जमाना था, जब ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ वामदलों को, उनके काडरों की उग्रता और उनके हिंसक व्यवहार को पानी पी पी कर कोसती थीं। आज जबकि वे सत्ता  में हैं उसी तरह की घटनाओं की सुर्खियां बनना और विपक्ष द्वारा लगातार उनके कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों को उठाना और लगभग हर चरण के चुनाव में वहां हिंसा होना लगातार  भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जाना, न तो उनके लिए सही है और न ही बंगाल की छवि के लिए सही है इसका भान उन्हें रखना होगा। उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि  हिंसा और उग्रता क्या होती है और विरोधियों पर कितना भारी पड़ती है। कारण वे इसकी भुक्तभोगी रह चुकी हैं। अब यदि उनके नेतृत्व में चल रही सरकार के नाक के नीचे उनके ही पार्टी के कार्यकर्ता वैसा ही कार्य करेंगे, तो उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनका भी हाल माकपा की तरह होगा और एक बार सत्ता से बाहर हुईं, तो फिर जल्दी लौटना नसीब नहीं  होगा।
हमारी जनता मौका सबको देती है और भरपूर देती है, परंतु उसकी आशाओं पर विफल होने पर सारे द्वार भी बंद कर देती है, इसका स्वाद कई क्षेत्रीय दल चख चुके हैं। प्रजातंत्र में  सत्ता किसी भीदल की बपौती नहीं है वह आती और जाती रहती है। इसलिए सत्तासीन होने पर किसी भी दल का आचारव्यवहार सिर्फ और सिर्फ जनता का चौमुखी विकास होना चाहिए। शासक के लिए रियाया का हर वर्ग और हर संप्रदाय समान होता है। उस पर यदि अल्पसंख्य परस्त का आरोप लगे विदेशी कलाकार उसके चुनाव प्रचार का हिस्सा बनें वह घुसपैठियों की हिमायत करता नजर आए तो यह ठीक नहीं। दुर्भाग्य से ममता बनर्जी इन सभी आरोपों का सामना कर रही हैं। इसके मद्दे नजर उन्हें अपनी आचार-विचार और  व्यवहार में ऐसी तब्दीली लानी होगी कि वह ऐसे आरोपों से बचें और राज्य में सही और सर्वसमावेशी विकास सुनिश्चित कर यह विश्वास जगाए कि वह सबकी है। तब तो लंबी  चलेगी नहीं, तो उनको भी इतिहास बनाने में समय नहीं लगेगा। बंगाल देश का कई मायनों में अगुवा था और कोलकाता एक जमाने में देश में मुंबई की जो आज हैसियत है वह  रखता था, परंतु माकपा और अन्य वामदलों की नीतियों ने उसका बंटाधार कर दिया। अब ममता को जब मौका मिला है, तो अपने प्रयासों से कोलकाता का स्वर्णिम अतीत पुन:  बहाल करने का प्रयत्न करना चाहिए न कि माकपा बन जाने जैसे व्यवहार हो। यदि माकपा और वामदलों का शासन अच्छा होता, तो उनकी आज इतनी दुर्दशा न होती कि वे केरल  तक ही सिमट कर रहे जाते और इस चुनाव में जो संकेत हैं, वे अपने अब तक के इतिहास की सबसे कम लोकसभा सीटें प्राप्त करने जा रहे हैं और बचे एकमात्र राज्य केरल में भी  उनकी हालत बहुत अच्छी नहीं है।
यदि ममता ने शासन का अपना तौर-तरीका नहीं बदला और अपनी कुछ भी बोलने की आदत पर लगमा नहीं लगाई, तो उनकी भी अवस्था वैसी ही हो सकती है। कारण उनका तो आधार ही अभी एक राज्य में है। महत्वाकांक्षा बुरी बात नहीं है, परंतु अति महत्वाकांक्षा बुरी बात है। आज बीस-पच्चीस सीटों पर लड़कर प्रधानमंत्री बनने की ललक बहुत दलों के नेताओं की है, परंतु उसके आवेश में आकर प्रधानमंत्री के लिए भी कुछ भी बोल जाना, घुसपैठ और अल्पसंख्यक परस्ती कारण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कुछ भी बोल जाना, जितना आपत्तिजनक है उतना ही घातक भी। कारण उसका बेजा फायदा उठाए जाने की ज्यादा संभावना रहती है, इसलिए अभी भी बदलाव लाएं तो ठीक, वरना नियति किसी को भी नहीं छोड़ती और उनको भी छोड़ेगी ऐसा नहीं लगता।

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