मान न मान मैं तेरा मेहमान

अभी एक चरण का चुनाव होना बाकी है और मतों की गिनती उसके चार दिन बाद है। कोई भी विश्लेषक भाजपा की हालत खराब नहीं बता रहा है। अधिकांश सर्वेक्षण इस मत के हैं कि एनडीए की ही सरकार पुन: सत्तासीन होने जा रही है। इसके बावजूद थर्ड फ्रंट का स्वयं घोषित एजेंडा को लेकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री की ओर से दिल्ली से दौलताबाद तक एक  किए हुए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने अच्छे कार्य किए हैं और लगातार दूसरा चुनाव जीते हैं और इस लोकसभा चुनाव में भी उन्हें अच्छे  प्रदर्शन की उम्मीद है, परंतु यदि वह तेलंगाना की कुल सीटें भी जीत जाएं, तो भी लगभग डेढ़ दर्जन सीटें लाने की संभावना वाले व्यक्ति के लिए ऐसी उछल कूद और सत्ता की  छटपटाहट कितनी उचित है? सफलता अच्छी बात है, परंतु जब वह सिर चढ़ कर बोलने लगे, तो खतरनाक होती है। केसीआर उसी दौर से गुजर रहे हैं। इसके पीछे उनकी असली  मनसा अपने आपको उप प्रधानमंत्री के रूप में भी देखने की बताया जा रहा है। ऐसी ही हालत 1989 में थी, जब कांग्रेस की उस समय की अजेय छवि से त्रस्त विभिन्न दलों के कई  नेता उनके खिलाफ खड़े हो गए और सरकार भी बनी पर कितने दिन चली, हां उसके बाद देवगौड़ा और गुजराल के प्रधानमंत्री बनने के बाद जो कांग्रेस और अन्य दलों के बैसाखियों  के बलबूते सत्तासीन हुए और वैसे ही बाहर हुए तमाम छुटभैए नेताओं में प्रधानमंत्री बनने की लालसा जग रही है। पर वह भूल रहे हैं कि वह दौर दूसरा था, आज का दौर दूसरा है।
उस समय कांग्रेस की अजेयता से भय था, आज भाजपा की शक्ति और मोदी के तेवर से डर लग रहा है। कारण उन्होंने राजनैतिक सुचिता स्थापित करने का अभियान छेड़ा हुआ है।  हद तो तब हो रही है, जब केसीआर अपनी नई रणनीति के अनुसार अन्य दलों के नेताओं से मिल रहे हैं और वे उन्हें चुनाव परिणाम आने तक रूकने की सलाह दे रहे हैं, परंतु  राष्ट्रीय नेता बनने की जल्दी में केसीआ सब्र नहीं कर पा रहे हैं और मान न मान मैं तेरा मेहमान वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए पूरे देश में राज्यों की राजधानियों का चक्कर  लगा रहे हैं। यह उनकी ही स्थिति को हास्यास्पद बना रहा है। वैसे भी आज कल हमारे देश में ऐसे राष्ट्रीय नेताओं की भरमार है, जिनका आधार अपने राज्य तक या राज्य के एक  वर्ग तक सीमित है, परंतु वे भी प्रधानमंत्री बनने या बनाए जाने का ख्वाब देख रहे हैं। अभी वैकेंसी है या नहीं, होगी भी या नहीं सब कुछ अधर में है, परंतु थर्ड फ्रंट के पुरोधा अधीर हैं और इन नेताओं की ऐसी ही अधीरता इन्हें कभी एकजुट नहीं होने देती है और यदि एक होते भी हैं, तो फिर कुछ दिनों में बिखर जाते हैं। कारण इनका ध्येय देश को मजबूत  करना नहीं, बल्कि ऐसी सरकार बने, जिसके ये चौधरी हों और उसके साथ मनमाना व्यवहार कर सकें या काम निकाला जा सके।जब कांग्रेस मजबूत थी तब इन्हें अखरती थी और  आज भाजपा मजबूत है, तो इन्हें अखरती है। इन्हें दिल्ली में कमजोर सरकार चाहिए, जिससे इनकी चौधराहट और राज्य में चल रही इनकी राजनैतिक दुकान में कोई बाधा न खड़ी  हो ऐसी सोच न तो देशहित में है और न तो देशवासियों के। इसे देश की जनता बखूबी समझती है, जब तक उल्लू सीधा हो भाजपा के साथ रहो, नहीं तो कांग्रेस का हाथ पकड़ लो  और अपने आपको राष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिक बनाए रखो। यह अवसरवादी खेल काफी पुराना हो गया है और देश की जनता भी इसे बखूबी समझती है। साथ ही देश को लेकर, समाज  को लेकर इनकी घडियाली आंसू को भी समझती है। इसलिए इन्हें दरकिनार कर प्राय: मजबूत सरकार के पक्ष में मत देती है। इसलिए केसीआर को राष्ट्रीय नेता बनाने के लिए  दिल्ली से दौलताबाद तक चक्कर नहीं लगाना चाहिए। वैसे आचार-विचार और उदहारण देश के सामने अपने कार्यों से प्रस्तुत करना चाहिए, जिससे देश उन्हें अपना नेता स्वयं माने।  जोड़-तोड़ से बड़ा नेता बनना तिकड़म से होना है, पात्रता से नहीं।

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