छोटे-छोटे दल और हमारा लोकतंत्र

जाति व्यवस्था हमारे समाज का सबसे बड़ा अभिशाप रहा है। इसके विरोध में तमाम आंदोलनों के बावजूद इसकी निष्ठा में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई है। आरक्षण से मिलने  वाली रियायतों और सुविधाओं ने इसे और जकड़ रखा है और जो व्यवस्था एक नियत समय के लिए थी, आज वह ऐसी व्यवस्था में तŽदील हो गई है कि आरक्षण को छेड़ने की कोई  भी दल हिम्मत नहीं कर सकता, परंतु विभिन्न जातियों के खेल ने राजनीति को एक ऐसे दलदल में परिवर्तित कर दिया है, जो हमारे प्रजातंत्र के लिए एक अलग तरह की चुनौती  बन गया है। हर जातियों में जागरूकता बढ़ी है और उनमें अपनी मत की ताकत का भी एहसास हुआ है। इसके साथ ही ऐसे नेताओं का भी इजाफा हुआ है, जो उक्त जागरूकता और  एहसास को भुनाकर अपनी राजनैतिक सियासत चमकाए रखने का कारोबार बहुत अच्छी तरह करते हैं, उनमें कुछ को जातीय भावना भड़काने में महारत हासिल है, तो कुछ को  क्षेत्रीय भावनाएं।
बड़ी-बड़ी लोकलुभावन बातें करके अपने लोगों को लुभाते हैं और उसकी शक्ति अपना राजनीतिक उल्लू साधने में लगते हैं। इन्हें अपने लोगों की याद तभी आती है, जब इनकी कुर्सी  या अस्तित्व को खतरा उत्पन्न होता है। ऐसी राजनीति समाज में विघटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ विकास को भी भोथरा करती हैं। अगड़ा-पिछड़ा का खेल इनका प्रिय सगल बना  हुआ है। ऐसे दलों में कोई अपने मत बैंक को बरकरार करने के लिए दूसरों को अपने साथ जोड़ने के लिए हास्यास्पद और खतरनाक हद तक जाते हैं। उससे देश का नुकसान हो।  सामाजिक एकता प्रभावित हो, उससे उसका कुछ लेना देना नहीं है। ऐसे दलों में सपा-बसपा, टीडीपी, टीएमसी, द्रमुकपरिवार और वंचित आघाड़ी और उत्तर प्रदेश और बिहार में  अस्तित्व में आए अन्य छोटे-बड़े दलों को गिना जा सकता है। अल्प-संख्यक नेता भी इसमें पीछे नहीं हैं। असम से लेकर चेन्नई को पार्टियां देश के कोने-कोने में विभिन्न जातियों  वोटों की नुमाइंदगी का दंभ भरकर मैदान में है। कांग्रेस और भाजपा दो राष्ट्रीय दल हैं, परंतु इन्हें भी इन बैसाखियों का इस्तेमाल मत बचाने के लिए करना पड़ता है, इनमें हर नेता  के अपने अपने अहम् हैं। अधिकार क्षेत्र हैं। चाहकर भी ये एक नहीं हो पाते। इसलिए कइयों की हैसियत वोट कटवा से ज्यादा नहीं है। लोकतंत्र में विचारधाराओं की बहुलता  अभिनंदनीय है। पुन:जब मकसद सिर्फ सत्ता पाना हो और येन-केनप्रकारेणअपने को राजनीति में प्रासंगिक बनाए रखना हो, तब वह सिर्फ समस्या ही बढ़ाता है। आवश्यक है इस दिशा में मतदाता और हर समाज के जागरूक जन कम से कम सोचना और लोगों को समझना शुरू करें। कारण राजनीति का मतलब व्यक्ति विशेष को किसी भी तरह से महिमा  मंडित करना नहीं है, बल्कि ऐसे लोगों का चुनाव करना है, ऐसी दलों को आगे लाना है, सत्ता में बिठाना है, जो सबका विकास सबको साथ लेकर करने का मादा दिखते हों और वह  भी उन आदर्शों और मान्यताओं के साथ जो हमारे संविधान में रेखांकित है। ऐसे दल राष्ट्रीय दलों की भी सोच को संकीर्ण कर रहे हैं। कारण उन्हें भी उनके अनुयाइयों का मत प्राप्त  करने के लिए उसी स्तर पर उतरना पड़ता है, जो कहीं न कहीं लोकतंत्र की प्रक्रिया की परिभाषा को ही बदल दे रहा है। मतदाता अपने मतदान का प्रयोग जाति, धर्म, क्षेत्र देखकर न  करे, बल्कि स्वविवेक से ऐसे दल के प्रत्याशी को मत दें, जो देश के चौमुखी विकास के लिए अच्छी सोच और करने की क्षमता रखता हो तभी सही होगा। अब देश के लोगों को और  जानकार दिग्दर्शको को हर स्तर पर मुखरित होना होगा और सही राजनीति कैसे हो और जो नकारात्मक्ताएं अभी भी हैं, उनको कैसे दूर किया जाए? इसके लिए हर संभव प्रयास  करना होगा और लोकतंत्र का स्वस्थ स्वरूप हमारे यहां हर दृष्टि से दिखे इस कार्य में जितना संभव हो, योगदना देना होगा।

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