नोटबंदी के ढाई साल बाद 22 प्रतिशत नकदी बढ़ी

नई दिल्ली
आठ नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऐलान के बाद 500 और 1000 रुपए के नोट बंद हो गए। तब सरकार ने नोटबंदी के पीछे कई कारण बताए। इनमें से एक नकदी का  सर्कुलेशन कम कर डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना था। लेकिन राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में दी गई जानकारी से उल्टी ही तस्वीर सामने आई है। नोटबंदी के महज ढाई साल  बाद नकदी कम होने की बजाय 22 फीसदी बढ़ गई है।

सिर्फ जनवरी 2017 में आई थी कमी
नवंबर 2016 में 500 और 1,000 रुपए के पुराने नोटों पर प्रतिबंध लगाने के बाद, जनवरी 2017 में नकदी में लगभग 9 लाख करोड़ रुपए की गिरावट आई थी। लेकिन इसके बाद से  ही वित्तीय प्रणाली में नकद राशि लगातार बढ़ रही है। भले ही सरकार और आरबीआई ने कम नकदी (लेस कैश), भुगतान का डिजिटलीकरण और विभिन्न लेनदेन में नकदी के  उपयोग पर प्रतिबंध लगाने जैसे कई कोशिशें की हों।

कालेधन पर भी नहीं हुआ था असर
नोटबंदी के वक्त सरकार का यह अनुमान था कि 500 और 1000 रुपए के नोट बंद करने से कालेधन पर वार हो सकेगा। जिन लोगों ने घरों में बड़ों नोटों के रूप में पैसा जमा कर  रखा है, वह नोट प्रचलन में न होने से बर्बाद हो जाएगा। लेकिन 2018 के लिए आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया था कि लगभग सभी पैसे बैंकिंग प्रणाली में वापस आ गए  थे। यानी लोगों के पास नकदी के रूप में कालाधन जैसा कुछ था ही नहीं। वहीं, बैंकरों के अनुसार आम तौर पर चुनावों से पहले सिस्टम में नकदी बढ़ जाती है। साथ ही त्योहारी और  शादियों का सीजन भी इसकी एक वजह है।

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