सपा-बसपा के दोस्ताने का पटाक्षेप

बड़े अरमान से अतीत के सारे गिले शिकवे भुलाकर, जिस आशा के साथ सपा और बसपा उत्तर प्रदेश का किला जीतने के लिए एक साथ आए थे, वह मोदी की सफलता की सुनामी में इसे झकझोरा गया कि एकदम मटियामेट हो गया और कुछ दिन पहले शालीन शŽदावली में दूरियां बढ़ने का संकेत देने के बाद अब मायावती ने अपने चिर परिचित अंदाज में सपा से सारे संबंध तोड़ अकेले चलने का एलान कर दिया है। नि:संदेह अब सपा के पास में भी एकला चलने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा है। एक बार फिर मायावती अपनी पार्टी को अपनी पैरों पर खड़ा करने का संकल्प लेकर मैदान में उतर रही हैं, परंतु उनकी सोच अभी भी पुरानी है। उस सोच ने उन्हें सत्ता का स्वाद चखाया है और कई बार चखाया है, परंतु 2014 से उनकी दाल नहीं गला रही है। कारण उसके बाद उत्तर प्रदेश की जनता ने भाजपा के केंद्र और राज्य के शासन में शासन का नया रूप देखा है, जिसमें चुनव जीतने के लिए कुछ और बोला जाय और जीतने के बाद सिर्फ अपना अपने परिवार और चाटुकारों का विकास किया जाए ऐसा नहीं होता। वहां राज्य देश और उसकी जनता का विकास किया जाता है और यही कारण है कि जाति और अल्पसंख्यकवाद का भोथरा खेल खलेकर उसके बल पर सत्ता सुंदरी को वरण करने का सपा-बसपा और रालोद का प्रयास औंधे मुंह गिर पड़ा और सारे किरदार तितर-वितर हो गए, अब ये सारे किरदार उसी  वारवाद, जातिवाद,अल्पसंख्यकवाद को आधार बनाकर मैदान जीतना चाहते हैं, जो मोदी और शाह की राजनीति और विकास के समाने भूसपाट हो चुका है। ये दल  2014 में अलग-अलग लड़कर और 2019 में एक साथ आकर देख लिए कि वह तिलिस्म टूट चुका है फिर भी उसी राह पर राजनैतिक हार किरी से कम नहीं है, फिर भी यह वही राह अपना रहे हैं, तो जनता इन्हें और सबक देगी। कारण उन्होंने अपने कार्यकाल में सिर्फ स्वयं कल्याण और स्वपरिवार के कल्याण के अलावा जो कुछ किया, वह कोरम पूर्ति से ज्यादा नहीं है। काम €या होता है यह सर्वत्र दिख रहा है उन्होंने बिजली, सही रास्ता  कारोबार सब ल€जरी बना दिया था और कानून व्यवस्था तो देश में हास्य का पात्र थी कुख्यात लोगों को भी अपनी पार्टी की सदस्य बनाने से इन्होंने परहेज नहीं किया और उन्हें यह उनके परिजनों को टिकट देना आम बात थी। बसपा पर टिकट बिक्री को संस्थागत स्वरूप देने का आरोप लगता है और किसी को कुछ भी बोल जाने में उनका कोई परेसानी नहीं है एक दौर था, जब शोषित, पीड़ित वर्ग को लक्ष्यकर काल्पनिक शोषण का चित्र खींचकर और शाहू महाराज, महात्मा फुले बाबासाहेब आंबेडकर के नाम का इस्तेमाल कर इन्होंने राजनीति में अपनी जगह बनाई और बाद में जो कुछ किया, वह इनके आदर्शों के प्रतिकूल था। ये मालामाल हो गए, इनके परिजन मालामाल हो गए इनके चाटुकार बन गए, परंतु इनका साथ देनवाली जनता को कुछ नहीं मिला। अब जब जनता से सब कुछ मिल रहा है और इसका एहसास उन्हें हो रहा है, तो फिर इन्हें राजा बनाने वे €यों इनके साथ जाएंगे, परंतु इन्हें अभी लगता है कि पुराने नारे तेवर और सोच से इनकी राजनैतिक दुकान चमक उठेगी, तो यह मुगालते में हैं। वैसे भी बड़े नेताओं का मुगालत देर में दूर होता है। इनका भी मुगालता दूर होगा, तब तक शायद संभलने का मौका न मिले। देखना यह है कि वह समय कब आता है, सपा-बसपा गंठजोड़ के अध्याय का पटाक्षेप हो गया है, परंतु मोदी के सुनामी से उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में तहस-नहस विपक्ष अभी भी खड़ा होने की कोशिश कर रहा है, परंतु खड़ा होने के लिए जन विश्वास की उसकी आशाओं पर खड़ा होने की, नियति की गारंटी देने की शक्ति इनकी नहीं है और जब तक ऐसा नहीं कर पाएंगा, इनका दिन लौटना मुश्किल है। कारण मोदी और योगी सरकार लगातार विकास की बड़ी-बड़ी लहरों से इनका किनारे से आगे बढ़ना मुश्किल करते रहेंगे। 

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