अच्छी और आल्हादकारी शुरुआत

पुरानी कहावत है 'जब मार पड़ी शमशेरो पर तो महाराज मैं माऊं हूं' आज कश्मीर पर एकदम सटीक बैठती है और केंद्रीय गृह मंत्री के रूप भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जम्मू कश्मीर की पहली यात्रा के दौरान जो नजारा देखने को मिल रहा है यह उसे शत-प्रतिशत प्रमाणित करता है। यह भाजपा नीत केंद्र सरकार की सख्त नीतियों का प्रतिफल है, जिसने  आज वह कर दिया, जो पिछले तीस साल में कभी नहीं हुआ। इस बार किसी भी संगठन ने केंद्र के प्रतिनिधि के वहां दौरे पर जाने बंद का आवाहन नहीं किया। यहां तक की हुर्रियत  के भी किसी धड़े ने ऐसा करने की हिमाकत नहीं की, यह उब्त राज्य में घट रही एक अभिनंदनीय घटना है। केंद्र सरकार की आतंकवादियों, अलगाववादियों , उनके हमदर्दों, उनको  प्रश्रय देने वालों पर सख्त कार्रवाई अब अपनी परिणाम दिखा रही है और जैसे पिछले दिनों राज्यपाल ने कहा कि अब तो हुर्रियत भी बात करने को तैयार है से वह साबित हो रहा  है। परंतु गृहमंत्री का कड़ा रुख बरकरार रखने का संकेत और हुर्रियत से कोई भी बातचीत करने का इरादा न होने का संकेत दर्शाता है कि अब हमारी सरकार आतंकियों और  अलगावादियों से किसी भी तरह की कोई बातचीत करने की मूड में नहीं है। अब इनके कुकर्मों का दंड इन्हें मिलेगा। इन पर जाबा लगने के बाद घाटी में स्थित सही राह पर होना के  संकेत इस बात के प्रमाण है कि वे अलगाववादी है जो पाक के भाड़े की हैवानों के साथ मिलकर घाटी को पिछले तीन दशक से उपद्रवग्रस्त बनाए हुए हैं, इन्हें समझाने का इन तीस  सालों में कई प्रयास हुए। कांग्रेस शासन काल में इन्हें चुप रहने के लिए धन तक दिए जाने की बात सुर्खियों में आई। प्रधानमंत्री मोदी ने भी शांति से मामला सुलझाने के तमाम  प्रयास किए, परंतु वहां उपद्रव, खून-खराबा कम नहीं हो रहे थे। परिणामत: वही किया गया जो करने की दरकार बहुत पहले से थी और जो करने की हिम्मत इसके पहले की सरकारों  ने नहीं दिखाई और वह था जैसे को तैसा व्यवहार और वही किया गया। आतंकियों को चुन-चुनकर निशाना बनाने के साथ उनके हमदर्दों, उन्हें साधन-सुविधा मुहैया करने वाले लोगों  और संगठनों सब पर एक साथ कार्रवाई शुरू की गई और अब परिणाम सामने आने लगा है। यहां तक कि अब पंडित भी घाटी में पुन: जाने और बसने की सोच ही नहीं रहे। एकाध  हिम्मती परिवारों ने जाने भी शुरू कर दिया है और जब कमाई के सारे रास्ते बंद हो गए और सिकंजा कसा गया तो अब हुर्रियत को फिर बात करने की याद आ रही है। जिस तरह  से ये नेता अलगाववाद की अलख जगा रहे थे, बातचीत का प्रस्ताव ठुकरा रहे थे। तब इनकी यह दरयादिली कहां थी। ये देश के खिलाफ अपराध कर रहे थे। अब जब शिकंजा कसने   लगा तो बात करना चाहते हैं, परंतु ऐसा करते समय वह भूल रहे हैं कि जिनसे वे बात करना चाहते हैं वे उनका गिरगिट की तरह रंग बदलना खूब जानते हैं। इन्हें कितना जन  समर्थन है, उसकी भी कलई धीरे-धीरे खुल रही है। अब बारी इनकी गतिविधियों के अवसान और जम्मू कश्मीर में शांति की बयार बहने की जिस तरह इन पर कार्रवाई हो रही है।  स्पष्ट है कि इन्हें अपनी पापों का हिसाब देना होगा। इसलिए लगता नहीं है कि मौजूदा निजाम इनसे बात करेगा और करना भी नहीं चाहिए, कारण इनकी करतूतों से हमारा एक  इलाका दशकों से बेहाल है। निर्दोषों की जान जा रही है, लोग अपनी ही देश में शरणार्थी बनाने को बाध्य हैं। इसके लिए जो भी जिम्मेदार हैं, उसका खामियाजा तो उसे भुगतना ही  चाहिए। जम्मू काश्मीर की जनता भी अब इनकी असलियत से रूबरू हो रही है। परिणामत: आतंक की सतत सफाई से और गुमराह और अलगाववादी तत्वों का सच उजागर होने और  उन्हें कटघरे में खड़ा किए जाने के साथ अब घाटी और पूरे राज्य में शांति बहाली के संकेत आने लगे हैं जो एक अच्छी और आहालाद्कारी शुरूआत है, जिसका हर देशवासी की यह  आशा बलवती हो रही है कि अब धरती का स्वर्ग गुलजार होगा।

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