ऐसा कब तक चलेगा

चुनाव परिणाम आने के बाद काफी समय बीत चुका है। नई सरकार जोर-शोर से अपने काम में लग चुकी है, परंतु बंगाल शांत नहीं हो रहा है और अब तो वहां बम के धमाके तक  बात पहुच गई है। ऐसे में कोई भी केंद्र सरकार चुप नहीं बैठ सकती। भले ही कानून व्यवस्था राज्य की जिम्मेदारी है, परंतु वह तब तक, जब तक वह सही रहे और राज्य सरकार  निरपेक्षता पूर्वक उसे संभालती नजर आई आज जो सूरते हाल है वहां के बाशिंदे सीबीआई की जांच की मांग कर रही हैं और खुलेआम यह आरोप आगे रहे हैं कि सरकार से उन्हें सही  और निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद नहीं है। ऐसी बातें और आरोप उस समय और गंभीर हो रही है। जब घटनाएं घटने की बजाए बढ़ रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे षड़यंत्र बता  कर राजनैतिक Žबयान देकर अपने इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती कि कानून व्यवस्था उनकी जिम्मेदारी है और उन्हें इसको सही करने के लिए हर संभव कदम उठाने चाहिए  और ऐसा करते समय रियाया को यह नहीं लगना चाहिए कि उसमें भेदभाव हो रहा है या टीएम के कार्यकर्ताओं को वरीयता दी जा रही है। खाली भाजपा या केंद्र को बुराभला कहने से  ही उनके कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती। उन्हें सरकार के पास उपलब्ध साधन स्रोत का पूरा उपयोग कर पहले वहां की हिंसा पर विराम लगना चाहिए और कानून व्यवस्था की  स्थिति सामान्य होने देना चाहिए। उसके बाद बाकी बातें होने चाहिए। कोई भी जिम्मेदार केंद्र सरकार किसी भी राज्य में ऐसी स्थिति बरकरार रहते हुए लंबे समय तक मूकदर्शक नहीं  रह सकती। भले ही वहां सत्तासीन दल उसका जो अर्थ लगाए और Žबयान दे। ममता को यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी बंगाल में हो रहा है, वह लंबे समय तक चला तो वह  न बंगाल के हित में हैं और न ही उनकी सरकार के। यह दोनों की छवि खराब कर रहा है।

अच्छी शुरूआत
केंद्र सरकार द्वारा दर्जन भर आयुक्त स्तर के अधिकारियों की छुट्टी एक बड़ा कदम है। यह ऐसे अवसरवादी भ्रष्ट अधिकारियों के लिए चेतावनी होगा, जो अपनी अवांछनीय क्रिया- कलापो से पूरी व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे हैं और गेहूं के साथ घुन पीसने की कहावत को चरितार्थ करते हुए उन लोगों की भी छवि खराब करते हैं, जो पूरी कर्तव्य निष्ठा  से, सेवाभावना से अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं और ऐसे लोगों की संख्या देश के विभिन्न संस्थानों में ऊपर से नीचे तक काफी ज्यादा है। यह सूरतेहाल कुछ सेवाओं का है  ऐसा भी नहीं है। अपने को साहेब समझने की और साहब बनाकर कुछ भी करने की और जनता को नौकर समझने की मानसिकता करीब-करीब हर महकमे में हैं। प्रधानमंत्री मोदी  व्यवस्था के इन दीमकों से अच्छी तरह वाकिब है और उन्होंने हर स्तर पर जो सफाई की यह प्रक्रिया शुरू की है। इसकी गूंज पूरी देश में होगी और चाहे वह सरकारी संस्थान हों या  स्थानीय निकाय हर जगह से ऐसे तत्व बाहर होने चाहिए जो अपने भ्रष्ट आचरण से न सिर्फ विकास कार्यों में अवरोध बना रही है, बल्कि देश की छवि भी खराब कर रहे हैं  नौकरशाही की यह आवधारणा की एक बार कुर्सी पर बैठे तो कोई उनका कुछ नहीं कर सकता। भले ही वह कुछ भी करे यह बदलनी चाहिए और उपरोक्त कार्रवाईयां ऐसी प्रवृति पर  रोक लगाने की दिशा में सही कदम है। यह एक अच्छी शुरुआत है। जवाबदेही तो होनी ही चाहिए।

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