कोई इधर गिरा कोई उधर गिरा

चुनाव के पूर्व पूरे देश में महागठबंधन की अलग ही बयार चल रही थी, विभिन्न पार्टियों के बड़े-बड़े नेता खूब धमा चौकड़ी मचाए हुए थे, जिसमें केंद्रीय भूमिका निभा रहे थे शरद  पवार और चंद्रा बाबू नायडू। परंतु हुआ वही, जो ऐसे दलों में हमेशा होता आया है। इसके पहले भी कभी तीसरी शक्ति के नाम से, कभी जनता पार्टी के नाम से, कभी जनता दल के  नाम से ये दल एकजुट हुए थे और केंद्र में सरकार बनाने तक पहुंचे थे, परंतु हमेशा आधी राह में तितर- वितर हो गए। इस बार तो यह कुनबा एक ही नहीं हो सका। कारण क्षेत्रवाद  और जातिवाद छोड़ दें, तो बाकी इनमें और कांग्रेस के एजेंडे में कोई फर्क नहीं है। अपने-अपने राज्यों में साथ मिलकर लड़ने का मतलब है, जहां कांग्रेस हाशिए पर है और वर्षों से है  उसे जीवनदान देना, जो किसी भी दल को गवारा नहीं था। भले ही मोदी का भय उन्हें एक होने के लिए मजबूर कर रहा था। कारण मोदी युग में सही तरीके से शासन करना उनकी   मजबूरी बन गई और जोड़तोड़ और तिकड़म के बल पर देश में चौधरी बनने की जो आदत कमजोर केंद्र सरकारों के समय नायडू आदि की पड़ गई थी, वैसा अब नहीं चल रहा था।  कुल मिलाकर एक साथ सभा करने और भाजपा तथा केंद्र सरकार को कोसने और संविधान एवं निरपेक्षता पर कल्पित हमले का रोना रोने से ज्यादा गठबंधन की बात आगे नहीं बढ़  पाई। देश के सबसे बड़े सूबे उत्त प्रदेश में सपा-बसपा ने कांग्रेस को अकेले छोड़ दिया, जबकि महाराष्ट्र, बिहार जहां ये शक्तियां कुछ हद तक एकजुट हो पाईं, कोई करिश्मा नहीं   दिखा पाई। कारण जनता-जनार्दन में इनको लेकर यह विश्वास पुख्ता हो गया है कि ये सिर्फ अपना और अपने परिवार और चाटुकारों का विकास सुरक्षित करने के एजेंडे पर ही  काम करते है। इनके पास देश के विकास का कोई ऐसा वैकल्पिक एजेंडा नहीं है, जो भाजपा की नरेंद्र मोदी नीत सरकार के एजेंडे से बेहतर हो। ये तो पुरानी व्यवस्था को खुलेआम  चालू रखने के लिए एकजुट हो रहे हैं। इनका एका सिर्फ अपनी चलाए रखने का एका है, जिसमें जाति,धर्म, क्षेत्रवाद का खेल होता रहे। भ्रष्टाचार की गंगोत्री में नहाते रहें और यदि  ऐसा करते हुए राज्य और देश का कुछ विकास हो जाता है, तो ठीक है, नहीं तो वह इनकी प्राथमिकता नहीं है। अपने आपको बचाने में लींन ये लोग इस बात का अनुमान ही नहीं  लागा पाए कि प्रधानमंत्री मोदी उनकी टीम ने अपने पांच साल के कार्यों के दौरान इतना कुछ कर दिया है कि एक सही और अच्छी सोच वाली सरकार देश का क्या कर सकती है?  यह जनता को समझ में आ गया है। इसलिए उसने कांग्रेस सहित महागठबंधन के शिल्पकारों और रणनीतिकारों के एजेंडे को खारिज करते हुए अपने निर्णायक जनादेश के तहत एक  बार फिर भाजपा और राजग पर पहले से भी ज्यादा भरोसा जताया है। इसने गत सात दशक से चल रही राजनीति को भूसपाट कर दिया है और विकास,राष्ट्रवाद राष्ट्रीय  सुरक्षा,राष्ट्रीय एकता और विश्व में राष्ट्र का सम्मान को देश का मुख्य एजेंडा बनाते हुए बाकी सभी नाकारात्मक वादों को धत्ता दिया है। अब इन दलों को भी चाहिए कि इस  चौंधियाने वाले जनादेश की लौ में अपनी अधोगामी एजेंडे को जांचे, जो समाज को विखंडित करने वाली, जातिवाद और भ्रष्टाचार की पोषक नकारात्मक प्रवृतियों को बढ़ाता था। शायद  ही ऐसा कर उसमें वांछित सकारात्मक बदलाव लाएं यही उनके और देश के हित में है। कारण सबका साथ और सबका विकास और सबका विश्वास पर जो दल चलेगा भारत की  जनता उसी को जनादेश देगी। यह पिछले दो लोकसभा चुनाव से जाहिर है और जिस तरह यह सरकार अब तक चली है और जैसा आगे भी चलने का संकेत रही है। अब पुराने मुद्दों  और पुराने तौर तरीकों पर महागठबंधन के लोगों को अपने दलों को बचा के रख पाना मुश्किल होगा। अब नए भारत की नई बयार में सबका एजेंडा सर्वसमावेशक होना पड़ेगा। नहीं  तो कोई इधर गिरा कोई उधर गिरा तक ही बात नहीं रुकेगी समाप्त होने का भी खतरा है।

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