प्रकृती के उपहार है गेहूं और चावल

चरक सूत्र में वर्णित किया गया है कि प्राणियों के प्राण अन्न हैं। अन्न द्वारा प्राणी जीवित रहता है। संसार अन्न की ओर दौड़ता है। मनुष्य में वर्ण, प्रसन्नता, स्वर का ठीक रहना,  बुद्धि की तीक्ष्णता, सुख, संतोष, पुष्टि, बल, मेधा आदि सभी अन्न पर आश्रित हैं। मानव शरीर के लिए कृषि, व्यापार आदि कर्म हैं, स्वर्ग प्राप्ति के लिए वैदिक योग (संतान) आदि  कर्म हैं और मोक्ष प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्य आदि कर्म होते हैं। यह सभी अन्न पर निर्भर होते हैं।

गेहूं
गेहूं में विटामिन ए, बी और ई पाया जाता है। यह शीतल, मीठा, बलकारक, शरीर को पोषण प्रदान करने वाला, हृदय को बल देने वाला होता है। यह सर्वश्रेष्ठ अन्न होता है। इसमें  चर्बी का अंश कम होता है। इसके आटे की रोटी मोटी बनाकर खानी चाहिए। अत्यंत पतली, हल्की रोटी अधिक लाभकारी नहीं होती है, क्योंकि पतली रोटी में से विटामिन आग की आंच से नष्ट हो जाते हैं।
नए गेहूं के आटे की रोटी कŽज व कफ उत्पन्न करती है और एक वर्ष पुराने गेहूं के आटे की रोटी खाने से कफ और कब्जियत नहीं होती है। गेहूं का दलिया अत्यन्त सुपाच्य और   निर्बल मेदे वालों के लिए अत्यंत हितकारी होता है। गेहूं को साफ करके धोकर भिगो दें। इसमें से अंकुर निकल आने पर कुछ दिनों प्रतिदिन खाने से स्त्री का बंध्यापन और पुरूष के  नपुंसकत्व के लिए हितकारी होता है। कम से कम दो तोला अंकुर वाले गेहूं का उपयोग करने से लाभ होता है।
इनके चोकरदार आटे की पुलटिस बनाकर बांधने से फोड़े का दर्द मिट जाता है और फोड़ा पककर फूट जाता है। फोड़े को पकाने का यह सरल उपाय है। एक छटांक गेहंू लेकर रात में  भिगो दें। सुबह इनको पीसकर, छानकर, चीनी मिलाकर एक सप्ताह तक पीने से प्रमेह रोग दूर हो जाता है।

चावल
चावल मधुर, बल देने वाला, पित्त का नाश करने वाला, वायु और कफ को थोड़ा बढ़ा देने वाला, भूख बढ़ाने वाला, वीर्यवर्धक, शरीर को पोषण प्रदान करने वाला होता है। स्निग्ध,  मल को थोड़ा कम करने वाला, पेशाब को अधिक लाने वाला, लघु, रूचिकारक, चिकना, प्रमेह और कृमि को दूर करता है।
हाथ के कुटे चावल में अधिक स्वादिष्ट और पुष्टिकारक होते हैं। इनमें विटामिन ए, बी मिलता है जो मशीन के कुटे चावलों में नहीं होता है। धान को मशीनों द्वारा कूटकर पॉलिश  कर देते हैं जिससे चावल की ऊपरी परत और अंकुर नष्ट हो जाते हैं। लाल चावल अधिक गुणदायक और स्वादिष्ट होता है। चावल पकाते समय उसका मांड (पसावन) निकाल देने से  चावल गुणहीन हो जाता है। इनका पसावन अत्यन्त शीतल और पौष्टिक होता है। साठ दिनों में तैयार होने वाले साठी चावल को वरी का चावल भी कहा जाता है और यह अधिक  गुणकारी होता है। यह चावल लाल और मोटा होने के कारण लोग इसका सेवन नहीं करते। यह चावल संग्रहणी, दस्त और मंदाग्नि वालों के लिए पथ्य गिना जाता हैं। पचने में हल्का,   वायु उत्पन्न नहीं करता और बलप्रद होता है।
चावल के मांड़ (पसावन) में शहद मिलाकर पीने से तृषा रोग ठीक हो जाता है। सिर्फ चावल का मांड़ (पसावन) पीने से भांग का नशा उतर जाता है। चावल का चूर्ण (चिवड़ा)  पुष्टिकारक, मल को विसर्जित करने वाला, बलप्रद और मैथुन-श€क्ति को बढ़ाने वाला होता है। चावल और उनके आटे से विभिन्न तरह के पकवान बनाये जाते हैं। चावल प्यास को   कम करने वाला होता है। मधुमेह के रोगी के लिए यह अहितकर होता है। चइंदीवर मिश्र

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