यह कौन सी राजनीति है

अभी चार दिन नहीं बीते हैं। हिंदी थोपने की आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर तमिलनाडु में बवाल खड़ा किया गया था। इस आधार पर अपनी राजनीति चमकाने वाले द्रविड़ दलों  में तमिल के रक्षण की प्रतियोगिता शुरू हो गई थी, परंतु सरकार द्वारा यह स्पष्ट करने पर ऐसा कुछ नहीं है, उनका राजनीति करने का प्रयास फुस्स हो गया। अब इस कड़ी में नई शुरुआत ममता दीदी करती नजर आ रही हैं। चुनाव से ही वहां हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। आज उसके लिए उनकी आलोचना हो रही है। चिकित्सकों ने अलग से हड़ताल  छेड़ रखा है, उनकी समस्या का समाधान करने के बजाय उनको हड़का रही हैं और अब अपनी विफलता छिपाने के लिए बंगाल में बांग्ला भाषा अनिवार्य का नारा दे रही हैं। हमारी  राजनीति की यह विडंबना है कि जब राजनीतिक माहौल आपके पक्ष में न हो, तो कोई ऐसा भावनात्मक सगूफा छोड़ दें कि लोग उसमें व्यस्त हो जाएं और आपकी राजनीतिक दुकान  चलती रहे। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे राजनीति में मिल जाएंगे। ममता की यह नई पुड़िया अब तक इस विंदु पर शांत बंगाल में एक नई बहस और विवाद को जन्म देगा। इन सभी   नेताओं को अपने बच्चों को अंग्रेजी में पढ़ाने में कोई दिक्कत नहीं है, परंतु हिंदी का नाम आते ही इन्हें अपनी क्षेत्रीय भाषा की गरिमा खतरे में पड़ती नजर आती है। ऐसा बचपना  खेल सत्ता के लिए हमारे ही नेता कर सकते हैं, जबकि असली खतरा अंग्रेजी से है। दुनिया के सभी विद्वान इस बात से एकमत है कि बच्चा उसी भाषा में अपने भावोद्गार सही  तरीके से व्यक्त कर सकता है, जो उसने मां की गोद में सीखा है। इस मान्यता के आधार पर हर राज्य की भाषा स्वीकारणीय है, सम्माननीय है और होनी भी चाहिए, परंतु उसके   साथ-साथ यदि वह विदेशी भाषा पढ़ सकता है, तो एक और अपनी उस भाषा को क्यों नहीं पढ़ सकता, जो देश ही नहीं दुनिया में भी सबसे ज्यादा बोली और पढ़ी जानी वाली भाषा है  और वह अपनी राष्ट्रभाषा हिंदी है। अपनी राज्य भाषा में पारंगत व्यक्ति यदि उसे अन्य भाषा न आए तो उसे उस दायरे से बाहर जाने पर क्या स्थिति होती है यह भुक्तभोगी ही बता  सकता है। अपने संपर्क के लिए वह विदेशी भाषा का आवलंब देश में ही लेता है, तो फिर अपने ही देश के अधिकांश भाग में बोली समझी और उपयोग में आने वाली भाषा को वह  अपनी भाषा के साथ क्यों नहीं अपना सकता। दक्षिण के कुछ राज्यों में यह विरोधाभास की उन्हें वहां की क्षेत्रीय भाषा के साथ अंग्रेजी सीखना चलता है पर हिंदी नहीं, समझ से परे  है। इससे राजनीतिक रोटी सेंकने के सिवाय कोई और फायदा नहीं है। उलटा यह न सीखने वाले नागरिकों के लिए अखिल भारतीय स्तर पर विकास के कई ऐसे दरवाजे बंद करता है,  जो हिंदी के माध्यम से खुलते हैं। अब ममता इसी भाषाई हथियार का इस्तेमाल बंगाल में करना चाह रही हैं। जहां ऐसी बात अब तक कभी नहीं थी, राजनीति के लिए ऐसे स्तर तक   गिरना सही नहीं है, यह कैसी राजनीति है। राजनीति लोगों को जोड़ने के लिए होती है, तोड़ने के लिए नहीं। संविधान किसी भी नागरिक को देश में कहीं आनेजाने, बसने नौकरी  रोजगार करने की आजादी देता है और वहां पहुंच कर व्यक्ति अपनी संघर्षों से अपनी बात संप्रेषित करने का तरीका निकाल ही लेता है। कारण यदि वह ऐसा नहीं करेगा, तो टिक  नहीं पाएगा। उसमें राजनीतिक कारणों से खाई खोदना सही नहीं है। राजनीति का जवाब राजनीति से देना होगा। ओछे हथकंडों से नहीं। इससे देश की भावनात्मक एकता प्रभावित  होती है, लोग गुमराह होते हैं, जो अनावश्यकसमस्याओं का कारक बनती है।

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