चरमराती स्वास्थ्य सेवाएं और जनसंख्या का दबाव

बिहार में चमकी के प्रकोप ने देश में स्वाथ्य सेवाओं को लेकर एक नई बहस और चर्चा को जन्म दे दिया है। नि:संदेह देश के संसाधनों पर जनसंख्या का काफी दबाव है। उसके  अनुपात के अनुसार डॉक्टरों की, अस्पतालों की जो उपलब्धता होनी चाहिए, वह नहीं है। परंतु जो हैं, वह भी ठीक से काम नहीं कर रही है और उसका सबसे बड़ा कारण इस विभाग  में व्याप्त भ्रष्टाचार और लापरवाही और स्वार्थांधता है ,जिस पर मोदी युग में बहुत करारा प्रहार किया जा रहा है, परंतु कई दशकों की आदत जल्दी नहीं नियंत्रित हो सकती और इसमें राज्य सरकारों की भूमिका ज्यादा है और उनका प्रयास, उनका निरीक्षण, परीक्षण का तौर-तरीका मौजूदा व्यवस्थाओं को चाक चौबंद करने में पूरी तरह विफल रहा है। किसी भी  सरकारी  अस्पताल में चले जाइए गंदगी, दवाओं की कमी आम बात है। यहां तक की मरीजों के साथ व्यवहार भी सही नहीं होता और जिस तरह लोग चारों ओर बिखरे हुए दिखते हैं  उसकी तुलना में कई भीड़भाड़ भरे इलाकों की हालत शत-प्रतिशन अच्छी करार दी जा सकती है। सरकारी टैग लग गया तो हालत खराब मान लिया जाता है और यह सिर्फ दीन हीन  लोगों की आश्रय के रूप में तŽदील हो जाता है और जहां निजी टैग लग जाता है, वहां सब कुछ ठीक है। ऐसा नहीं है, सेवाएं चाक-चौबंद हो सकती हैं, परंतु मानवता गायब है। ऐसा  बिल बनाते हैं कि अदा करने वाले को गश आ जाए। जहां सस्ता है, वहां भ्रष्टाचार और लापरवाही है और जहां सब कुछ ठीक लगता है, वहां लूट है, तो मरीज जाएं कहां? अब समय  आ गया है कि इस ओर अविलंब ध्यान दिया जाए। कारण इस विभाग पर केंद्र और राज्य सरकारों का काफी पैसा व्यय हो रहा है। डॉक्टर से लेकर हर तरह के स्टॉफ को भारी  भरकम पगार दी जाती है। भवन से लेकर मशीनरी तक और उसके रख-रखाव पर करोड़ों का धन खर्च हो रहा है। दवाई और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है, तो  फिर क्यों मरीजों को दीनहीन बनाया जाता है। उनसे अनुचित वसूली की जाती है और दवाएं और अन्य समान बाहर से लाने को बाध्य किया जाता है। कारण आजादी से लेकर आज  तक इन क्षेत्र में जितना धन लगाया गया है यदि उसका सही नियोजन होता, तो शायद आज जनसख्या के दबाव का रोना रोकर उस विभाग की नाकामी छिपाने का प्रत्यन न किया   जाता। किसी भी आपदा के सामने सबसे बुरी हालत हमारी स्वास्थ्य सुविधा की समाने आती है और यही क्यों सरकारी नाम अकर्मण्यता का पर्याय हो गया है। परिणामत: लोग मुफ्त  की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं का परित्याग कर खुशी- खुशी निजी संस्थानों में जाते हैं और वहां लुटकर भी संतुष्ट होती हैं। कारण उन्हें कम से कम वहां सही सेवा की गारंटी मिलती  है। यह पूरी व्यवस्था की शोकांतिका है। जिसके बारे में सबको सतर्क होनी और कार्यरत होने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यवस्था के इन आवश्यक अंगों में सुधार लाने  के लिए, जवाबदेह बनाने के लिए कई प्रभावी कदम उठाएं हैं, परंतु इनमें कुछ बातें ऐसी है, जिसमें राज्य सरकारों और ग्रामस्तर से लेकर ऊपर तक पूरे नौकशाही तंत्र को जवाब देह  बनना होगा। इसकी भी शुरुआत प्रधानमंत्री ने नाकाबिल और कार्य अक्षम अधिकारियों को जबरदस्ती पद मुक्त कर कर दी है। कारण बिना नौकरशाही के इमानदारी से अपनी कर्तव्यों  के पूरा करने से स्थिति सही नहीं होगी। सबको अपना काम इमानदारी से और पूरी क्षमता से करना होगा। तभी बात बनेगी और जनता को सही सेवा मिल सकेगी और वह बिना  चरमराए सही तरह से काम कर सकेगी। दुरव्यवस्था की जिम्मेदारी जनसंख्या नहीं हमारी काम चोरी और भ्रष्टाचार है।

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