यूएस ने खत्म किया भारत का जीएसपी दर्जा

नई दिल्ली
अमेरिका ने भारत से जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (जीएसपी) का दर्जा छीन लिया है। यह फैसला बुधवार से (5 जून) लागू भी हो गया है। भारत ने डॉनल्ड ट्रंप के फैसले को  दुर्भाग्यपूर्ण तो बताया लेकिन इसको लेकर ज्यादा आवाज नहीं उठाई। आखिर जीएसपी के मुद्दे पर भारत इतना शातं क्यों है?

एक्सपायरी डेट
अमेरिका द्वारा अन्य देशों को व्यापार  में दी जाने वाली तरजीह की सबसे पुरानी और बड़ी प्रणाली जीएसपी की शुरुआत 1976 में हुई थी और भारत को तब से ही इसका लाभ  मिल रहा था। जीएसपी का दिसंबर 2020 में खत्म होना पूर्व निर्धारित था। ट्रंप के फैसले से हुआ यह है कि यह डेढ़ साल पहले खत्म कर दिया गया है।

सीमित था फायदा
दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र और सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच द्विपक्षीय कारोबार वित्त वर्ष 2019 (अप्रैल दिसंबर) में 65.1 अरब डॉलर का था और इसके भारत के पक्ष में अधिक झुके होने के बावजूद जीएसपी दर्जे का फायदा 19 करोड़ डॉलर तक सीमित था, क्योंकि 6 अरब डॉलर का भारतीय निर्यात ही ड्यूटी फ्री था।

अब अर्थव्यवस्था मजबूत
जीएसपी इसकी शुरुआत दुनिया के सबसे गरीब देशों के लिए की गई थी, ताकि वे ट्रेड के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकें और गरीबी से बाहर निकल सकें। दर्जा प्राप्त  120 देशों के हजारों प्रोडक्ट्स से ड्यूटी हटा ली गई थी। भारतीय अथॉरिटीज का दावा है कि भारत को अब जीएसपी जैसे कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं है, भारत अब अविकसित  अर्थव्यवस्था नहीं है।

बदल भी सकता है अमेरिका का स्टैंड
कोई यह कह सकता है कि भारत के पास इस मुद्दे को विश्व व्यापार संगठन के पास ले जाने का विकल्प है, भारत पहले ऐसा कर भी चुका है, जब ईयू ने 2002 में जीएसपी का  दर्जा खत्म कर दिया था, भारत को इसमें जीत मिली थी। दूसरी तरफ अमेरिका का इतिहास जीएसपी दर्जा खत्म करने के बाद दोबारा बहाल करने का भी रहा है, जैसा कि इसने  पिछले साल अर्जेंटीना के साथ किया था।

दोनों की जरूरत
चीन के बाद अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है। यह बताता है कि क्यों नई दिल्ली ने भारतीय स्टील और एल्युमीनियम पर अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाए जाने  के बाद 20 करोड़ डॉलर के अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाने के फैसले को 8 बार टाला है। दूसरी तरफ कई अमेरिकी कंपनियों जैसे अमजॉन, वॉलमार्ट, गूगल और फेसबुक ने भारत  में अरबों डॉलर का निवेश किया है और आर्थिक जवाबी कार्रवाई से बात बिगड़ सकती है।

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