जानलेवा पर्यावरण

एक अभूत पूर्व और ऐतिहासिक घटना, जिसने बड़ों-बड़ों के पसीने छुड़ा दिए वह हादसा है, जो झांसी में हुआ, जिसमें गर्मी से बेहाल चार यात्रियों ने प्राण छोड़ दिए। शायद ही कोई  दिन ऐसा है, जब पानी की बातें सुर्खियां नहीं बन रही हैं। लोग मीलों जाकर पानी ला रहे हैं और ऐसा पानी पीने के लिए अभिशप्त है, जो जानवरों के लिए भी अनुपयुक्त है। यह  इस देश में हो रहा है, जहां प्रकृति की मेहरबानी पर दुनिया रश्क करती है, साथ ही ऐसी घटनाएं किसी रेगिस्तानी इलाके में नहीं सुनाई दे रही हैं बल्कि उन इलाकों में सुनाई दे रही  हैं, जहां पानी पर्याप्त बरसता है। कई इलाकों में तापमान 50 का आकंड़ा पार कर रहा है। इसके बाद भी हमारे देश में इसे लेकर जो गंभीरता होनी चाहिए, जो चिंता होनी चाहिए, वह  नहीं दिखाई दे रही है। बहुत पहले से ही इस संबंध में जानकर यह चेतावनी देते आए हैं कि यदि सही ध्यान नहीं दिया गया, तो एक दिन ऐसा आएगा, जब पानी के लिए युद्ध होगा,  परंतु हम अन्य बातों को लेकर जितने सचेत हैं, इसे लेकर उतने सचेत नहीं है। इसका एकमात्र और प्रमुख कारण पर्यावरण को लेकर की गई हमारी आवाम की गलतियां हैं।  भूपिपासा और अन्य प्रलोभनों ने और नई तकनीकी पर हमारे निर्भरता ने हमें इतना आलसी बना दिया है कि हम पर्यावरण अनुकूल विकास को भूलकर एक ऐसी जीवन शैली अपना  रहे हैं, जिसमें हर वस्तु की आवश्यकता काफी ज्यादा है और पर्यावरण के लिए ठीक प्रयोगों को तिलांजलि दे रहे हैं। जिसका असर खराब हवा, पानी की कमी आदि नाना प्रकार से  प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है और कहीं अति वृष्टि, कहीं अनावृष्टि, सूखा, तो कहीं अत्यधिक गर्मी, तो कहीं अत्यधिक ठंडी का कारण बन रहा है। माना कि हम पर जनसंख्या का  दबाव है हमें खेती के लिए, आवास के लिए ज्यादा जमीन की जरूरत है, लकड़ी की जरूरत है, लेकिन वह बाद में उसे पहली जरूरी है शुद्ध हवा है। कारण इसके बिना कुछ पल भी  जीवन मुश्किल है और उसके बाद उतना ही जरूरत पानी की है। इसके बाद अन्य जरूरतें है और यह क्यों खराब हो रही है या अपर्याप्त हैं। इसके बारे में हर सोचने समझने वाले  व्यक्ति को ध्यान देने की जरूरत आ चुकी है। कारण जब तक इस दिशा में सोचेंगे नहीं, इन गंभीर खतरों के बारे में और उसके कारकों के बारे में जागरूक नहीं होंगे। इसका इलाज  नहीं होगा, जबकि बीमारी लगातार बढ़ती जा रही है, परंतु अभी भी इसके इलाज को लेकर जो गंभीरता हमारे देश और समाज में होनी चाहिए वह नहीं दिखाई दे रही है, जो कुछ हो   रहा है वह समस्या की निरंतर बढ़ती विकरालता के समाने ऊंट के मुंह में जीरा है। सरकारी प्रयास स्वयम सेवी संथाओं के प्रयास तभी सार्थक होंगे, जब इसमें जन-जन की भागीदारी  होगी। कारण जिस तरह से जन साधारण द्वारा प्रर्यावरण प्रतिकूल उत्पादों का प्रयोग बेधड़क जारी है और जिस तरह कई अभी भी पर्यावरण का अहितकर कार्य हो रहे हैं उससे साफ   जाहिर है कि आज भी समाज का एक-एक बड़े वर्ग को इस दिन रात बढ़ती समस्या की जानकारी नहीं है, यह है भी तो वह पर्याप्त नहीं है पर्यावरण में हो रही खतरनाक तŽदीलियों  और उसका मानवीय जीवन पर पड़ रहे प्रभावों से मानवता को बचने का एक ही तरीका है, हम सब ऐसा जीवनशैली अपनाएं, जो प्राकृतिक के अनुकूल हो और जो शुद्ध हवा, शुद्ध  पानी और ऐसा वातावरण निश्चत करे, जो मानव के सही विकास और सही जीवन के लिए जरूरी है, तभी शुद्ध हवा और शुद्ध पानी उपलब्ध होगा और गर्मी और ठंडे दोनों असहनीय  और जानलेवा नहीं होगी।

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