आतंक और बात साथ-साथ नही

प्रधानमंत्री ने एक बार फिर बातचीत की पाक की मांग को ठुकराते हुए विदेश जाने के लिए ओमान और ईरान का रास्ता चुना है। यह एक तरह से पुनरुच्चार है उस नीति का, जो   पाक के सबंध में हमारा देश अनुसरण कर रहा है कि बातचीत और आतंकवाद साथ-साथ नहीं चल सकते। यह एक तरह से पाक को एक नया झटका है, जो किसी भी तरह से   बातचीत शुरू करने का आकांक्षी है, उसकी आर्थिक अवस्था दिनों दिन सोचनीय हो रही है। जैसे कि उनके प्रधानमंत्री अपने बयान में कह रहे हैं। इससे पाक की आवाम पर क्या गुजर  रही है यह भी सर्व विदित है। इसके बाद भी आतंक के कारोबार पर कोई कठोर कार्रवाई करने के बजाय सिर्फ और सिर्फ बातचीत की ही राग अलापना समझ से परे है। कारण अभी  सीमा पार से पाक द्वारा सीज फायर का उलंघन जारी है। आए दिन घाटी में आतंकियों से झड़पें हो रही हैं। सुरक्षा बलों को निशाना बनाने का प्रयास आताताइयों द्वारा हो रहा है,  जिनसे दो-दो हाथ करने में हमारी सेना और सुरक्षा बल लगे हुए हैं और स्थिति काबू में भी आ रही है। ऐसे हालात में पाक के प्रति जरा भी नरमी सही नहीं है। सरकार जानती है  कि उसने इस बार निर्णायक पहल की है और इस बार चाहे वह उनके साधन स्रोतों को समाप्त करना हो, उनसे सहनुभूति रखने वालों को निशाना बनाना हो या अलगाववादियों या  पत्थरबाजों पर कार्रवाई हो सरकार और सेना का रुख बेहद कड़ा है, तो वहीं आम आदमी के साथ उसका रवैया बेहद उदार है। कुल मिलाकर निर्णायक घेराबंदी और मोर्चेबंदी हुई है।  रोज आतंकी मारे जा रहे है।
सर्जिकल स्ट्राइक और अन्य कदमों से सरकार ने पाक को भी यह जता दिया है कि अब हम आर-पार के मूड में हैं और अब कोई हिमाकत का जो अïंजाम होगा, उसकी कल्पना भी  पाक नहीं कर सकता। हमारा सामना करने की ताकत पाक में कभी नहीं थी और आज तो उसकी जो आर्थिक खस्ताहाली है उसके मद्देनजर तो उसका सांस लेना दूभर है। साथ ही   दुनिया में भी कोई अब उसकी पैरोकारी करने को तैयार नहीं है। यहां तक कि हरदम साथ खड़ा रहने वाले चीन की भी एक सीमा है, जो मसूद अजहर प्रकरण से साफ है। ऐसे में  पाक सरकार यह समझ रही है कि अब उसका आतंक का खेल उसके लिए घातक है। परंतु सेना और उसकी खुफिया एजेंसी और सरकार में कितना तालमेल है, यह दुनिया को पता  है। हमारे साथ कई बार ऐसा हुआ है जब वहां की सरकार की दोस्ती के हाथ को पकड़ने के बाद हमारे साथ धोखा हुआ है। कारण वहां की सेना या खुफिया एजेंसी में बैठे लोग यह  नहीं चाहते थे कि दोस्ती हो, तो आज भी ये तीनों किरदार वैसे ही मौजूद हैं। ऐसे में भारत को इनके साथ कड़ा रुख अपनाने के सिवाय कोई दूसरा चारा नहीं है। कारण जब तक वहां  के निजाम के इन उक्त किरदारों का स्वर एक नहीं होता, तब तक धोखा होने की आशंका हमेशा बरकार रहती है और ऐसा हमारे साथ कई बार हुआ है और जिसे मौजूदा सरकार  जानती है, तो इस बार जब तक आतंक पर रोक नहीं लगती और उसका भरोसा और प्रमाण हमें नहीं दिया जाता, तब तक पाक की बातचीत की आवाज को नकारात्मक प्रतिसाद ही  मिलेगा इसलिए पाक पहले अपना घर सुधारे , आतंक का खूनी खेल बंद करे, तभी कुछ संभव है वरना मोदी सरकार दुस्साहस का जवाब कैसे देती है यह उसने उरी और पुलवामा  हमले के बाद जान लिया है। इससे सबक ले और सही राह चले, नहीं तो उसका अंजाम क्या होगा, उसे जान जाना चाहिए। आतंक का कारोबार बंद करने के सिवाय पाक के पास  कोई चारा नहीं है।

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