हिचकोले खाती कांग्रेस

अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी अभी जहां एक और लोकसभा चुनाव में करारी हार से बाहर नहीं आ पाई है, वहीं दूसरी ओर पार्टी की विभिन्न राज्य इकाइयों में घमासान और आया  राम और गया राम का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है और पार्टी आलाकमान की नाक में दम कर रहा है। इसी के साथ नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों की लागातार  भविष्यवाणी कि यदि कांग्रेस को बाहर आना है, तो उसका नेतृत्व बदलना होगा, पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की समस्याओं में लगातार इजाफा कर रहा है। पंजाब से लेकर तेलंगाना तक  जहां देखो वहीं खुलेआम गुटबाजी और बगावती तेवर और इस्तीफों का अंतहीन सिलसिला चल रहा है और पार्टी का पूरा तंत्र हतोत्साहित नजर आ रहा है। कांग्रेस सही रहे उसका  अध्यक्ष बरकरार रहे, इसकी चिंता कांग्रेस नेताओं से ज्यादा सहयोगी दल करते नजर आ रही है।
लगातार दो लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पिटने वाली पार्टी को हाल के विधान सभा चुनाव में तीन राज्यों में मिली चुनावी सफलता भी विस्मृत हो गई है। जिस पर आज नहीं तो  कल कांग्रेस नेतृत्व को सोचना होगा। अब यह राहुल गांधी को तय करना है कि वह पार्टी को रसातल में जाने देते हैं या उसे उबारने के लिए निर्णायक पहल करते है। कारण जैसे  कांग्रेस चल रही है और जिस तहर गठजोड़ और बैशाखियों के मार्फत उसने मोदी सरकार को बदल कर सत्ता सुंदरी को वरण करने का प्रयास किया। वह जनता जनार्दन खारिज कर  चुकी है, उनकी कई नीतियों को उसके प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष गठजोड़ों को नकार दिया है विशेषकर हिंदीभाषी बेल्ट और पश्चिम और पूर्व भारत में उसका प्रदर्शन उसका पार्टी संगठन के  कोमा में होने और उसके वादों-इरादों कोजनता की नजर में भरोसा खो देने का सबूत है। जिसे राहुल गांधी को समझना होगा। सबसे पहले तो उन्हें देश को समझना होगा। उसकी शैली  समझनी होगी। देश और दुनिया के बड़े-बड़े शिक्षा संस्थाओं से बड़ी-बड़ी पदवी प्राप्त लोग नेता को सलाह दे सकते हैं। उसके सहयोगी हो सकते है। स्वयं नेता नहीं बन सकते, नेता तो  जमीन से जुड़ा होता है। ऊपर से नहीं थोपा जाता, जबकि कांग्रेस को जानने वालों का स्पष्ट मत है कि कांग्रेस में ऐसे लोगों की भरमार है और जो नेता बचे हुए हैं, उनमें अधिकांश  की सोच और तौर तरीके कालवाह्य है। नेता बनाने की प्रक्रिया बंद आलाकमान की नीतियों, जिसमें चाटुकार और खुशामद करने वालों की भरमार हो गई है, पार्टी के बेड़ा गर्क होने  का सबसे बड़ा कारण है। दूसर कारण है सम विचारीदलों पर निर्भरता और भाई जब राज्य में उनसे लड़ोगे और उनके साथ सरकार बनाने का सपना देखोगे और बनाओगे तो फिर  बढ़ोगे कैसे? कांग्रेस का अपना जनाधार, अपने पास रोकने में विफलता और खोया विश्वास पाने में असफलता नए लोंगो में उसकी साख कम होने का और उसका आकर्षण खत्म होने  का सबसे बड़ा कारण है। कारण उन्हें लगता है कि जब वहां रहकर कुछ मिलने वाला ही नहीं है, तो वहां क्यों जाएं। तीसरा सबसे बड़ा कारण है लंबे समय तक सत्ता में रहना उसकी  ऐसी आदत है कि वह पाने के लिए कोई भी जोड़तोड़ करो कहीं भी सीटों का कैसे भी आदान-प्रदान करने, जिसने भी पार्ट की साख गिराई है और अंतिम पर महत्वपूर्ण कारक पार्टी के  अनुसांगिक संगठनों की अनदेखी है।
वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहते हैं कि चुनाव कराकर हमारे अध्यक्ष से युवक कांग्रेस खत्म कर दी। सही है कारण इसमें भी मालदार नेता पुत्रों का कब्जा हो गया है, जो जीतने के बाद कुछ  करते ही नहीं अपने को साबित करने के लिए भीड़ जुटाने, सम्मेलन, परिचर्चा आदि का आयोजन धरना-प्रदर्शन सदस्यता अभियान सब बंद। परिणामत: पार्टी ही बंद हो रही है।  कमोबेश यही हाल महिला, सेवादल और छात्र शाखा सबका है इसे रोकना है, तो कांग्रेस की विचारधार पर अडिग रहते हुए उसके जतना के बीच पहुंचाने और उसका विश्वास जीतने  और नए नेतृत्व के खड़ा करने के तौरतरी के सब पर विचार करना होगा और बैशाखियों पर नहीं, बल्कि अपने पैरों पर चलना होगा। तब तो बात बनेगी नहीं, तो जिस तरह कांग्रेस  की नाव कदम-कदम पर हिचकोले खा रही है उसका और गहरे पानी में जाना तय है और ऐसा भी हो सकता है कि डूब जाए, इसलिए राहुल गांधी को अब शोक-शॉक से बाहर आकर  पार्टी को बचाने का काम शुरू करना चाहिए। अन्यथा यह जिम्मेदारी किसी और को सौंप, भारत भ्रमण करना चाहिए। कुछ समय के लिए यह करना भी लंबे समय में फायदेमंद होगा।

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