बदलाव जरूरी

मानव जीवन में शिक्षा की कितनी आवश्यकता है यह आज के युग में बताने की जरूरत नहीं है और यही कारण है कि हमारे देश में जहां आजादी के बाद अशिक्षित लोगों की तादाद  बहुत ज्यादा थी, इस ओर विशेष ध्यान दिया गया और प्राथमिक स्तर तक की मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराने का सिलसिला जो शुरू हुआ, वह अब तक जारी है। यही नहीं माध्यमिक  स्तर और उच्चस्तर तक तमाम ऐसे व्यवस्थाएं और सहूलियतें है, जिसके बलबूते हर वर्ग के छात्रों के लिए शिक्षा का द्वार खुला है। इसके बाद शिक्षित वर्ग की संख्या में काफी  सुधार हुआ अभी भी कमियां है, वह तेजी से भरी जा रही है। समय के अनुसार स्वरूप और आवश्यकताएं भी बदलती हैं और बदलनी भी चाहिए। इस दृष्टिकोण से हमारी सरकार का  प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च माध्यमिक स्तर तक शिक्षा के ढांचे में अमूल चूल बदलाव का विचार काबिले तारीफ है। कारण आज और आज के तीन दशक पहले के समय में काफी  कुछ बदला है, तो हम पुरानी लीक पर ही नहीं चल सकते। परंतु ऐसा करते समय आज की शिक्षा जगत की उन समस्याओं का भी ध्यान रखना होगा, उन चुनौतियों के बारे हमें भी  सोचना होगा, जो पूरी व्यवस्था को ही पंगु बनाए हुए हैं। मसलन आज का जो प्रारूप है, जितने तरह की बोर्ड है, जिनमें देशी-विदेशी की भरमार है, निजी और सरकारी संस्थानों में  जो फर्क है। विशेषकर प्राथमिक और माध्यमिक स्तर तक और विभिन्न राज्यों में एक ही स्तर की शिक्षा को लेकर जो असमानताएं है, वह दूर होना  चाहिए। कारण यह सब  मिलकर शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं और जो अंतत: छात्र के भविष्य को प्रभावित करता है। यह बात किसी भी समझदार व्यक्तिकी समझ परे हो सकती है कि जब  निजी संस्थानों की तुलना में सरकारी प्राथमिक विद्यालय और माध्यमिक विद्यालय के शिक्षक बेहतर प्रशिक्षित पदवीधर हैं और उन्हें अधिकांश की तुलना में भारी भरकम वेतन  दिया जाता है, तो फिर उन्हें क्यों निजी की तुलना में दोयम दर्जे का माना जाता है और लोग ज्यादा शुल्क देकर और स्कूल और प्रबंधन की तमाम लटकों-झटकों को झेलकर भी  लगभग मुफ्त मिलने वाली सरकारी शिक्षा को क्यों नहीं अपनाते, जबकि उच्च शिक्षा के स्तर पर ऐसी विकट स्थिति नहीं दिखाई देती। दोनों जगह पढ़ने वाले बच्चों के नजरिए और  सामान्य ज्ञान में भी काफी कमी पाई जाती है, जो उक्त व्यवस्था का ही परिपाक है। इसलिए आवश्यकता अनुसार पाठम्यक्रम में बदलाव के साथ-साथ वांछित अनुशासन कैसे हो,  कैसे छात्र को उ्दा स्तर की पाठम्यक्रमीय जानकरियों के साथ ऐसे उन तमाम जानकरियों से लैस किया जा सके, उनमें नैतिकता, समाज सेवा और देशप्रेम के ऐसे संस्कारों का  बीजारोपण किया जाए कि जब वह दुनिया की बाजार में उतरें, तो उसका ध्येय सिर्फ पैसा कमाना न रह जाए। वह एक ऐसा नागरिक बनें, जो देश की, समाज की समस्याओं के प्रति संजीदा और उनकी आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील हो। साथ ही हर स्तर पर अध्यापकों की भी जवाबदेही सुनिश्चित हो और मान्यता और प्रदर्शन में वे निजी संस्थानों के समकक्ष क्यों नहीं हो सकते। इसका भी अध्ययन हो और उन कारकों को चिन्हित कर ऐसे प्रयास हों, जिससे निजी संस्थानों में भीड़ न दिखे और सरकारी संस्थान खाली न नजर न आएं,   तभी बात बनेगी, सरकारी है, तो घटिया है, उसका स्तर ठीक नहीं है, जो यह धारणा हमारे समाज की बन गई है, उसे हर हाल में हटना चाहिए और यदि ऐसा होता है तभी बदलाव  का मतलब है, नहीं तो हर प्रयासों की तरह यह भी निष्फल होगा।

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