सुरक्षित बचपन की आशा

बाल यौन उत्पीड़न रोकने संबंधी पाक्सो कानून को और कठोर बनाने की केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी से सुरक्षित बचपन की एक नई उम्मीद जगी है। पिछले कुछ सालों से नाबालिगों  के साथ यौन उत्पीड़न और हिंसा की घटनाएं लगातार बड़ी हैं। इसी के मद्देनजर सरकार ने यह फैसला किया है। प्रस्तावित संशोधनों में बच्चों का गंभीर यौन शोषण करने वालों को  मृत्युदंड और नाबालिगों के खिलाफ अन्य अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। हालांकि दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद यौन उत्पीड़न संबंधी कानूनों को काफी  कठोर किया गया था। तब माना गया था कि इससे आपराधिक वृत्ति के लोगों में भय पैदा होगा और यौन हिंसा की घटनाओं में काफी कमी आएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ, बल्कि  उसके बाद से कम उम्र की बच्चियों के यौन उत्पीड़न और उनकी हत्या की घटनाएं बड़ी हैं। इसलिए मांग की जा रही थी कि पाक्सो कानून को और कठोर बनाया जाए। जघन्य यौन  अपराधों में मौत की सजा का भी प्रावधान किया जाए। इसलिए प्रस्तावित संशोधनों के बाद माना जा रहा है कि ऐसी घटनाओं पर काफी हद तक लगाम लगेगी। मगर देखने की बात  है कि इन कानूनों पर अमल कराने वाला तंत्र कितनी मुस्तैदी दिखा पाता है।
बाल यौन उत्पीड़न की कुछ वजहें साफ हैं। एक तो यह कि बच्चों को बहला-फुसला या डरा-धमका कर कहीं ले जाना और फिर उनका यौन उत्पीड़न करना अपेक्षाकृत आसान होता है।  छोटे बच्चे या बच्चियां कई बार ऐसा करने वालों को ठीक से पहचान नहीं पातीं, जिससे पुलिस को सबूत जुटाने में दिक्कत आती है। फिर कड़े कानूनों के बावजूद ऐसी हरकतें करने  वालों के मन में भय इसलिए नहीं पैदा हो पा रहा कि बलात्कार जैसे मामलों में सजा की दर काफी कम है। इसके अलावा आजकल इंटरनेट पर खुलेआम यौनाचार की तस्वीरें  उपलब्ध हैं। हर किसी के हाथ में मोबाइल फोन आ जाने से बहुत सारे लोग ऐसी तस्वीरें देखते रहते हैं। कई लोग ऐसी तस्वीरें साझा भी करते हैं, जिन्हें देख कर अनेक लोग   बलात्कार आदि के लिए प्रवृत्त होते हैं। जब उन्हें किसी तरह की मुसीबत में फंसने का अंदेशा नजर आता है, तो पीड़ित या पीड़िता की हत्या तक कर देने में संकोच नहीं करते।  इसलिए पाक्सो कानून में प्रस्तावित संशोधनों में अश्लील तस्वीरों यानी पोर्न फिल्मों पर भी नियंत्रण करने का प्रावधान किया है। अश्लील तस्वीरों के प्रसारण पर रोक की मांग भी  लंबे समय से उठती रही है, मगर कुछ लोग इसे यौन शिक्षा के लिए जरूरी बता कर ऐसा करने का विरोध करते रहे हैं। कानूनों को कड़ा बनाने के साथ-साथ पुलिस की जवाबदेही भी  अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना कानूनों पर अमल सुनिश्ति नहीं कराया जा सकता। बलात्कार जैसी घटनाओं में पुलिस की जांच में देरी होने से कई सबूत नष्ट हो जाते हैं। फिर कई  बार रसूखदार लोगों के प्रभाव में आकर भी कई मामले दबा दिए जाते या समझौते से उन्हें रफा-दफा करने का प्रयास किया जाता है। यूं कई लोग अपनी बच्चियों के साथ हुई यौन  उत्पीड़न की घटनाओं को इज्जत का मामला मान कर खुद चुप्पी साध लेते हैं, पर जो मामले सामने आते हैं वे पुलिस की ढिलाई की वजह से इंसाफ में न बदल पाएं, तो कानूनों  का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसलिए उन पक्षों पर भी गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है कि आखिर किस वजह से यौन अपराधियों को दंड नहीं मिल पाता।

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