नौकरशाही पर नकेल

गुरुवार से ही देश के विभिन्न स्थानों पर पड़ रहे छापे और उस दौरान बरामद हो रही नगदी और अन्य बेनामी संपत्ति के दस्तावेज जो कहानी बयां कर रहे हैं, वह जितनी भयानक  है उतनी ही हमारी नौकरशाही के लिए लज्जाजनक भी है। बहुत पहले एक नेता ने चर्चा में कहा था कि असली दीमक नौकरशाही है, जो एक बार सेवा में आ जाने के बाद अपनी सेवानिवृत्ति तक सिर्फ अपने ही स्वार्थ की सेवा में तल्लीन रहती है और जनसेवा जिसके लिए वह नियुक्त की जाती है, वह उसके लिए अपने उत्थान के प्रयासों से बचे समय में की  जाने वाली सेवा है। जिस तरह से इनके घरों से नकदी के बंडल निकल रहे हैं और वह भी लाखों में और जिन्हें गिनने के लिए मशीन लानी पड़ रही है, वह इस दुरावस्था का सबसे  जीता जागता प्रमाण है। यह सेवा के नाम पर मेवा की कहानी का कार्यक्रम और अपनी भावी सात पीढ़ियों का भला करने का सिलसिला रोकने का जो स्तुत्य कार्य मोदी युग में शुरू  हुआ है, वह तब तक जारी रहना चाहिए, जब तक नौकरशाही अपने कर्तव्य की सीमा रेखा में सच्ची जनसेवा न करना सीख ले और अपनी जेबें भरने के सारी क्रिया कलापों से तौबा  न कर ले और अपनी सही कमाई पर जीना न सीख ले। कारण प्रजातंत्र में नेता आता और जाता है, परंतु ये स्थाई है। जब ये ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट्राचार से सने होंगे और सिर्फ  अपनी कमाई पर ही ध्यान देंगे, वह चाहे जैसी हो, तो फिर देश और जनता का बंटाधार होना पक्का है। इसलिए भ्रष्ट्राचार और अकर्मण्य लोगों की हर महीने समीक्षा का सिलसिला  एक अच्छा और अनिवार्य कदम है, जिसे करने का माद्दा मोदी सरकार ने दिखाया और जिसे अब धीरेधीरे राज्य सरकारें भी अपना रही हंै अच्छी बात है। जवाबदेह और जिम्मेदार  नौकरशाही देश के लिए क्या कर सकती है इसके भी तमाम उदाहरण इसी नौकरशाही में हैं, जिन्होंने अपनी ईमानदारी, कर्मठता और कर्तव्यपालन से एक नया उदाहरण पेश किया है  और जिन पर देश को नाज है, परंतु उनकी संख्या बहुत कम है और उनके प्रति भ्रष्ट नेताओं और उनके ही भाई बंधु नौकरशाहों की कोप-दृष्टि और कुदृष्टि हमेशा रहती है। कारण वे  इस भेड़ चाल में नहीं आते, कम से कम अब वे राहत की सांस ले सकेगी और अपनी क्षमता का उपयोग और बेहतर तरीके से देश और समाज की सेवा भी दे सकेंगे। कारण सिर्फ  नेता ही भ्रष्ट है, ऐसा नहीं है। आप किसी भी सरकारी महकमे में पहुंच जाए, किसी काम के लिए जो सूरते हाल वहां नजर आते हैं, जिस तरह से निचले स्तर से लेकर ऊपर तक  का अधिकारी आपको नोचने खसोंटने का कार्य करता है, आम हो या खास उसे हलाकान होना ही पड़ता है। ये सब जिन्हें जनता के दु:ख दर्द का निवारक माना जाता है। विकास की  सीढ़ी हैं, सबसे बड़े अवरोधक बन गए हैं। कारण इन्होंने ने अपने आपको निरंकुश, अजेय और स्थायी मान लिया था और दीमक बन कर पूरी व्यवस्था को ही सफाचट कर रहे हैं।  इनकी अजेयता को झकझोरने की जरूरत थी। इनके भ्रष्ट्राचार को उजागर करने की जरूरत थी। यह एहसास कराने की भी जरूरत थी कि यदि अपने कर्तव्य का सही अनुपालान  ईमानदारी से नहीं करोगे, तो तुम पर भी कार्रवाई हो सकती है, बर्खाश्त हो सकते हो, जो अब होना शुरु हो गया है। जवाबदेही हो व्यक्ति को हो चाहे वह नौकरशाह हो या चपरासी,  चाहे वह देश का प्रमुख हो या पंचायत सदस्य, तभी बात बनेगी और मोदी युग में वही हो रहा है। अच्छी बात है कि इसका अनुकरण राज्य सरकारें भी कर रही है, जो बची हैं, उन्हें  भी करना चाहिए। तभी रामराज्य का सपना जो हर भारतवासी चाहता है पूरा होगा। इतनी सब गड़बड़ियों के बाद भी हम आज विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, तो यदि  सभी ईमानदारी से अपने कार्यों का निर्वहन करें, तो देश का पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनना पूर्णतया संभव है और यही प्रधानमंत्री कह रहे हैं। अब वह चाहे नेता हो या  नौकरशाह उसे ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा, नहीं तो उसके ऊपर भी निगाह है, यह एहसास हर कर्मी को, चाहे वह नेता हो या चाहे वह जिस स्तर का हो होना  जरूरी है। यह देश का सौभाग्य है कि ऐसा हो रहा है।

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