उचित प्रबंधन और संयोजन जरूरी

जिस तरह आज देश का बड़ा भू-भाग बाढ़ की त्रासदी झेल रहा है। देश के कई क्षेत्रों में फैला जाल रेल और रोड यातायत ठप है। लोग तरह-तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं।   देश में इसके चलते काफी जानें जा रही हैं। फसलों का, ट्रकों पर लादे सामानों का भयावह नुकसान हो रहा है। कारण कई दिन से अतिवृष्टि के चलते आवागमन ठप है। प्राकृतिक  आपदा पर किसी का जोर नहीं है। इससे दो-दो हाथ करने में सरकारी और गैर सरकारी प्रयास चरम पर हैं।
सेना, सुरक्षाबल, आपदा नियंत्रण की टुकड़ियां हर संभव प्रयास कर रही हैं कि आपदा की इस घड़ी में लोगों का जीवन रक्षण हो सके, उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जाए और उन्हें राहत प्रदान की जाए। इस दौरान कई ऐसे उदाहरण भी सामने आ रहे हैं। सेवा के, शौर्य के, हिम्मत, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं प्रेरणा ले सकते हैं। जिस तरह के हालात  मीडिया में दिखाई दे रहे हैं अब ऐसी आपदाओं से निपटने के लिए दीर्घावधि योजना की मांग करते हैं। आज भी जबकि भारी बारिश से देश के कई राज्य डूब रहे हैं। अभी देश के कई  कोने ऐसे हैं, जहां बारिश नहीं है या है भी, तो नाममात्र की। अब हमें कुछ ऐसे कृत्रिम उपाय सोचने होंगे। देश में नहरों का जलाशयों के निर्माण का और नदियों को जोड़ने की बहुत  पुरानी योजना पर इस तरह कार्य करना होगा कि जब ऐसे विकराल बारिश का हमसे सामना हो, तो वह पानी नुकसान या कहर न बने और उसे हम उन इलाकों की ओर मोड़ सकें,  जहां पानी की कमी है या उसका ऐसे साधनों में संचय कर सकें, जहां इसका बेहतर उपयोग हो सके और जो या पानीपानी या सूखा की स्थिति हर वर्ष हमें झेलनी पड़ती है। उससे देश को निजात मिल सके। कारण यह जानमाल का भारी नुकसान करती है, जो कहीं न कहीं हमारी विकास यात्रा को बाधित करती है। हमारे कई राज्य ऐसे है, जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश और देश के कई अन्य क्षेत्र, दक्षिण के कई हिस्से, पूर्व के कई भाग जहां बाढ़ की त्रासदी वर्ष दर वर्ष कायम हैं।
अचानक कुछ कहानी हो जाय, तो उसका मुकबला मुश्किल है, परंतु जहां यह वार्षिक कार्यक्रम की तरह हो वहां इसे लेकर सोचा जा सकता है और कुछ ऐसी योजना बनाकर उसे  कार्य रूप में परिणित किया जा कसता है कि त्रासदी या आपदा का असर कम से कम हो। यदि ऐसा होता है, तो जनता का बड़ा वर्ग जो हर साल बसता और उजड़ता है और उसमें  से एक बड़ी जनसंख्या अपनी जान गवां बैठती है, इससे बचेंगे और देश का जो बहुत बड़ा धन इनकी सहायता या पुनर्वास में खर्च होता है उसका बेहतर उपयोग विकास के अन्य  कार्यों में होगा। नदियों को जोंडने का काम पर बहुत कुछ किया और कहा जा चुका है उस पर द्रुतगति से काम करने की जरूरत है। साथ ही जल संचयन और संरक्षण के पुराने तौर- तरीके जो नई तकनीक और मशीनरी के चलते काल वाहम्य हो गई है। उनकी महत्ता समझने और उन्हें पुन: जीवित करने की जरूरत है। साथ ही नहरों का पर्याप्त जाल और वृक्षा  रोपण को और गति देने की जरूरत है। यदि यह सब होगा, तो हमारे पर्यावरण का संतुलन बेहतर होगा और हम अनावृष्टि और अति वृष्टि दोनों की विभीषिका से बचेंगे तथा  जनजीवन और सुरक्षित होगा, साथ ही हम विकास के नित नए सोपान चढ़ते जाएंगे। वैसे भी वैज्ञानिक लगातर सतर्क कर रहे हैं कि पर्वारण के असंतुलित संदोहन ने ऐसी विषमता  को जन्म दिया है कि गर्मी में ज्यादा गर्मी, ठंडी में ज्यादा ठंडी और बारिश में तेज रस्तार से बारिश होगी। जिसका अनुभव हम सबको हो रहा है। इसका एक ही इलाज का उचित  संयोजन और ऐसे कदम जो पर्यावरणा की विषमता जो मानवता की बेपरवाही का नतीजा है दूर हो और धरा पर हमारे और हमारी भावी पीढ़ी का जीवन सुजलाम सुफलाम हो।

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