नए विकल्प और शोध की ज़रूरत

सर से समय पर सतर्क होने और उससे जूझने की क्षमता हमारी बहुसंख्यक गरीब आबादी के पास नहीं है। कैंसर के अस्पतालों का अकाल तो है ही, उचित अस्पतालों तक गरीबों की  पहुंच बड़ी मुश्किल है। हर महीने आंखों के सामने, आस-पास और जानने वालों को कैंसर से तबाह होते देखा जा सकता है। कीमोथेरेपी के लिए गरीब मरीजों को सरकारी अस्पतालों  में भागते देखा जा सकता है। जिन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कम कीमत पर कीमोथेरेपी संभव है, वहां प्रतीक्षा सूची लंबी है। निजी अस्पतालों का खर्च गरीबों के बाहर है।  आयुष्मान योजना का लाभ बिना उपयुक्त अस्पताल और योग्य डॉक्टर के नहीं मिलने वाला। ऐसे में कैंसर के गरीब मरीजों के पास हर हाल में मौत एकमात्र विकल्प बचता है, मगर  यह कैंसर मौत तक पहुंचने के पूर्व परिवारों को भी निचोड़ लेता है। इलाज के लिए अस्पताल दर अस्पताल भागते, घर, गहना बेचते गरीब मरीज के साथ, उसका पूरा परिवार तबाह  हो जाता है। देश के जो बड़े अस्पताल हैं, वहां कैंसर के मरीजों का नंबर आने से पूर्व ही उनकी मौत करीब खिसक आती है। बनारस का नया बना कैंसर इंस्टीट्यूट हो, लखनऊ का  पीजीआई या मुंबई का टाटा इंस्टीट्यूट, डॉक्टरों की कमी और मरीजों की बढ़ती संख्या समस्या को और गंभीर बना रही है। अमीर लोग सिंगापुर, मलेशिया और ब्रिटेन तक इलाज के  लिए जा रहे हैं। एक आंकड़े के अनुसार, 2011 से 2015 तक अकेले सिंगापुर में 3,139 भारतीयों ने कैंसर का इलाज कराया। अमेरिका में भी कुछ भारतीय अपना इलाज करा रहे हैं।  बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने हमेशा मुनाफे को प्राथमिकता दी है। कीमोथेरेपी का आज तक कोई विकल्प तैयार न होने के पीछे दवा उत्पादक कंपनियों और इसमें प्रयुक्त होने वाली  मशीन का उत्पादन करने वाली कंपनियों का बड़ा हाथ बताया जाता है। भारत जैसे गरीब मुल्क ऐसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए बड़े बाजार हैं। वे इस बाजार को बनाए रखना चाहती  हैं। इस समस्या का समाधान केवल सरकारी स्तर के प्रयास से ही संभव है। जब तक दुनिया के वैज्ञानिक कैंसर से जूझ रहे मरीजों के हितों के लिए नए शोधों के साथ आगे नहीं आएंगे, स्थिति नहीं सुधरने वाली। बताया जाता है कि नए वैज्ञानिक शोधों पर भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पहरा है। इसलिए इस काम के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास होना जरूरी है।  आज देश में सालाना 12 लाख से ज्यादा कैंसर मरीज जुड़ रहे हैं। इनके लिए पर्याप्त अस्पताल नहीं हैं, जबकि आगे स्थिति और भयावह होगी। वर्ष 2020 तक कैंसर मरीजों की  संख्या में 50 प्रतिशत वृद्धि की बात कही जा रही है। इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि देश में कैंसर रोगियों की संख्या इतनी क्यों बढ़ रही है। मुंह के कैंसर के मुख्य  कारण गुटखा और पान मसाले पर प्रतिबंध लगा, पर कानून की अपनी व्याख्या कर कंपनियों ने अपना मुनाफा जारी रखने के लिए उत्पादों को भिन्न तरीके से बाजार में बेचना जारी  रखा। कीटनाशकों के अंधाधुंध और असुरक्षित इस्तेमाल के चलते पेट से जुड़े कैंसर पसर रहे हैं। दूध, दही, सब्जी, मछलियां, हवा-पानी सब कुछ जहरीला बन चुका है। जहरीली हवा  फेफड़े के कैंसर का मुख्य कारण है। प्रोस्टेट कैंसर भी पुरुषों में तेजी से फैला है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार, 2014 तक कैंसर से रोज 1,300 मरीज मर रहे  थे। ऐसे में, कैंसर के बेहतर इलाज और इसके निदान की दिशा में गंभीरता से सोचना समय की मांग है।

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