यह कैसी सियासत

जम्मू कश्मीर के बारे में जैसे ही कुछ नया कदम भारत सरकार द्वारा उठाया जाता है, वहां के दो राजनैतिक घरानों के पेट में मरोड़ उठने लगते है और वे क्या-क्या बोल जाते हैं। इसका उन्हें यह भी भान नहीं रह जाता है कि यह सभ्यता की हर मर्यादा पार कर रहा है और देश विरोध की हद तक जा रहा है। कोई जलजला उठने का संकेत दे रहा है, तो कोई  आग लगने का संकेत दे रहा है। जिस तरह की पाकपरस्ती और स्वार्थ परस्ती महबूबा दिखा रही हैं यह समझ से परे है। क्या वह हमारी ही खाकर और हमारे ही यहां से देश को  चुनौती देना चाह रही हैं। फारुख भी इसमें पीछे नहीं है। जैसे ही उन्होंने ने सुना कि अमेरिकी राष्ट्रपति मध्यस्थता करने को तैयार हैं। बाद में भले ही हमारी सरकार ने इसका जोरदार  खंडन किया और अमेरिका को भी सफाई देने में पसीना आ गया, परंतु फारुक जिस तरह से इसका स्वागत करते नजर आए, वह जितना हास्यास्पद है उतना ही त्रासदायक भी है कि  कैसे-कैसे नेता हमारे देश की राजनीति में सक्रिय हैं और उनकी प्राथमिकताएं कितनी बचकानी है । पीडीपी और एनसी ने लंबे समय तक जम्मू कश्मीर की बागडोर संभाली है, परंतु  इन दोनों के कार्यकाल के दौरान आतंकवाद की लड़ाई में ऐसा कुछ उल्लेखनीय नहीं किया गया या वहां से घाटी छोड़ने को मजबूर पंडितों को पुन: वहां बसाने के लिए ऐसा कुछ नहीं  किया गया, जिससे ऐसा लगे कि इन्हें अपनी सत्ता के अलावा और किसी बात की चिंता है। यह कहा जा सकता है कि सत्ता में रहते हुए इन्होंने कभी कोई ऐसा आंदोलन या मार्च  करने की हिम्मत नहीं दिखाई, जो आतंकवाद के खिलाफ लोगों को गोलबंद करे। उलटे गुमराह तत्वों और अलगाववादी ताकतों की तरफदारी करते नजर आए और उनके कैडरों पर भी  मिली भगत का आरोप लगता रहा है। यही नहीं इनके कार्यकाल के दौरान घाटी में आतंकी घटनाओं में भी वृद्घि होती देखी गई है। शायद यही कारण है कि राज्यपाल के मुंह से   निकल गया कि मारना है, तो भ्रष्टाचारियों को मारो। राजनीति में हर नेता और दल अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है और राजनीति का लक्ष्य ही सत्ता की प्राप्ति है। इससे किसी  को कोई एतराज नहीं हो सकता, परंतु ऐसा करते समय आप इस तरह व्यवहार करें कि आप देश की दुश्मनों की पैरोकारी करते नजर आएं। अलगाववादियों से सहानभूति व्यक्त  करते दिखें और गुमराह तत्वों का मनोबल बढ़े, ऐसे काम करते नजर आए तो यह सरासर गलत और आपत्तिजनक है, जबकि वहां की रियाया आपकी नहीं सुन रही है और वह  आपको खारिज कर चुकी है और राज्यपाल शासन और सेना की कार्रवाई अच्छा परिणाम देती है, तो फिर आप क्यों पूरे मामले में अवांछनीय टिप्पणी करके अपनी छिछालेदर करा  रही हंै और अपने आपको देश विरोधी साबित करने पर तुली हैं, जब आप कुछ कर सकती थीं, तब आपने कुछ नहीं किया। उसी जनता के बीच बिना सुरक्षा के आप चल नहीं  सकती, जिसे सेवा करने के लिए आप अधीर हैं। एक चुनाव हार जाता है और दूसरा अपनी सभाओं में अवरोध पैदा किया जाना देखता है। कश्मीरियत की बात करते हैं और पंडित  जो अपने देश में शरणार्थी बने हैं, उन्हें पुन: उनके घर-बार वापस ले जाने के लिए कुछ नहीं करते। पूरा देश और जम्मू कश्मीर की जनता देश की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए  अधीर है और इन्हें इसमें अपनी दुकान बंद होती नजर आती है, तो कुछ घरानों को राजनीति में रखने या उनके राजनीति को चमकाने के लिए देश के किसी कोने को उनके हवाले  नहीं किया जा सकता। ऐसे लोग स्वत: किनारे हो जाते हैं, कारण जन प्रवाह में बड़ी ताकत होती है और यही हाल पीडीपी का और एनसी का हो रहा है। बौखलाहट स्वाभाविक है,  परंतु ऐसा करते समय ये नेता राजनीतिक सुचिता की संवैधानिक परंपराओं की, उसकी सीमा रेखा की अवहेलना करते नजर न आएं, कारण यदि कोई ऐसा करता है और उसके क्रिया  कलाप और वक्तव्य देश के किसी भी तरह के दुश्मनों को बढ़ावा देने का काम करते है, तो उस पर लगाम कसने का विधान भी हमारे संविधान में है, हमारे कानून में है और यदि  ऐसी बचकानी हरकतें सिर्फ राजनीति या पाक को खुश करने के लिए जारी रहता है, तो इसका उपयोग दूर नहीं है। कारण कोई भी सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकती। इसका  ध्यान इन बडबोले आत्ममुग्ध नेताओं को जो अपने स्वार्थ में अंधे हैं, रखना चाहिए।

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