न इधर के रहे हम न उधर के रहे हम

पुरानी कहावत है न खुदा ही मिला न बिसाले सनम। इधर के रहे हम न उधर के रहे हम, यह कहावत आज कांग्रेस पार्टी पर पूरी तरह सटीक बैठती है और इसकी कहानी उस समय  लिखी जा चुकी थी, जब सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बनी थीं। नि:संदेह उनके नेतृत्व में दो बार कांग्रेस पार्टी केंद्र में सत्तासीन हुई, परंतु हमेशा उसे बैसाखियों का ही सहारा  लेना पड़ा। सोनिया ने राजनीति का चुनाव अपनी इच्छा से नहीं किया था, परिस्थितियों ने उन्हें देश की सबसे बड़ी पुरानी पार्टी की नेता सर्वोच्च नेता बना दिया। परिणामत:  उनका  देश को लेकर कोई सपना नहीं था। कोई संकल्पना नहीं थी, उनका लक्ष्य सत्ता पर बने रहना था और उसके लिए मत बैंक में तालमेल बिठाए रखना था और इसके लिए जैसी सलाह  चाहिए वैसी ही सलाह उनके सलाहकार देते गए। वे उस पर अमल करती रहीं। देश क्या चाहता है? देश की जनता को चौमुखी विकास के लिए क्या जरूरी है? देश कैसे दुनिया का  सिरमौर बनेगा आदि बातें गौड़ हो गईं और सब कुछ सिर्फ सत्ता प्राप्त करने के लिए और उसे बरकरार रखने के लिए किया जाने लगा। पार्टी के कर्ताधर्ता वास्तविकता से दूर हो गए  और कभी खैरात बांट कर तो कभी गंठजोड़ बनाकर भोथरा किस्म का अल्पसंख्यकवाद अपनाकर सत्ता का आनंद उठाते रहे। वास्तविकता से पुराने वर्षों से सत्ता पाकर मोटे रशूखदार  लोग जिन्होंने सांसद बनना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान लिया था, ऐसे लोंगो से कांग्रेस आलाकमान घिरता चला गया। इन्हें लगता था कि शासन चलाना सिर्फ इन्हें आता है। सिर्फ   परिवार निष्ठा और चाटुकारिता ही देश सेवा बन गई। यही कांग्रेस की नीति और शैली बन गई। मौलिक विचारधारा में इतने पेबंद लगाए गए कि वह कहां गई किसी को भी पता नहीं  और जैसे ही सामने एक ऐसा व्यक्ति आया, जो इनकी कमजोरी समझता था और भारत और उसकी समस्याओं को समझता था। कांग्रेसरूपी विरोधाभास का टोकरा चूर चूर हो गया  और आज वह अपने इतिहास के सबसे दयनीय अवस्था में है। रोज नेता पार्टी छोड़ रहे है, लेकिन भ्रमित और चाटुकार अवसरवादी नेता अभी भी पुरानी बीन बजा रहे हैं और 35ए  को हटाने जैसे मुद्दे पर भी ऐसे Žबयान दे रहे हैं जैसे वे कोई बाहरी व्यक्ति हों। उन्हें समझ ही  नहीं आ रहा है कि वे क्या कर रहे हैं। उन पर सिर्फ तरस ही आ सकता है कि एक  पार्टी जिसने आजादी की लडाई लड़ी, देश में निर्माण से योगदान दिया आज ऐसे छोटे लोंगो द्वारा स्वचालित हो रही है, जिन्हें पता ही नहीं कि वे जो बोल रहे हैं वह देशहित में है या   नहीं। संकेत साफ है कि अध्यक्ष विहीन कांग्रेस की कार्यसमिति यदि अब भी पार्टी को सिर्फ सत्ता के बारे में सोचने वाले नेतृत्व से और ऐसे सलाहकारों मुक्ति नहीं दिलाती, तो फिर  कांग्रेस को भी इतिहास बनने से कोई नहीं रोक सकता। आवश्यकता विरोध की नहीं, बल्कि कांग्रेस के सभी नेताओं को एकांत में बैठकर सोचने की है कि उन्होंने ऐसा क्या किया और  क्या कर रहे हैं कि लोग उनकी ओर देखना ही नहीं पसंद कर रहे हैं। कहीं न कहीं खोट जरूर है और उस खोट को पहचान कर उसे दूर करने की बजाय नेतागण उससे और भाग रहे  हैं और जो उसके पास नेता तो बड़े-बड़े हैं, पर जनाधार कहीं नजर नहीं आ रहा। उनके साथ न अल्पसंख्यक हैं, न बहुसंख्यक है, न पिछड़े न अगड़े हैं। पार्टी इन सबके बीच झूल रही  है और अध्यक्ष जिसे इन सब में स्पष्टता लानी थी, पलायन पर हैं। यह शोकांतिका है, उस दल की जो इसके चाहने वाले आज भी पूरे देश में हैं, पर दिग्भ्रमित और दिशाहीन हैं।

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