राज्य में भी राकांपा को ऐतिहासिक शिकस्त

देश में उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले राज्य महाराष्ट्र में जो दुर्दशा कांग्रेस-राकांपा आघाड़ी की हुई है, वह भी ऐतिहासिक है। दोनों मिलकर भी दहाई का आंकड़ा  नहीं पार कर पाए और राकांपा प्रमुख शरद पवार का देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने का सपना सिर्फ सपना ही रहा गया। यह कोई एक दो दिन में नहीं हुआ है।  यह उस लॉगडाट क्षरण का प्रतिफल है, जो दोनों दलों में 2014 के पहले से ही शुरू हुआ है। शरद पवार जैसा नेता अपनी पार्टी के नेताओं के भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा पाया और  उनकी पार्टी कभी भी ममता स्टालिन या नायडू की ही तरह पूरे राज्य की पार्टी नहीं बन पाई और राज्य की राजनीति में अपने परिवार की प्रमुखता रखने की उनकी शैली उन तमाम  मराठा क्षत्रपों को भी नाराज कर गई, जिनकी पार्टी के रूप में उसकी पहचान थी। रही बात कांग्रेस की, तो वह राज्य में राकांपा से बड़ी पार्टी होने के बावजूद भी कांग्रेस के दिल्ली  दरबार में पवार की धमक के चलते हमेशा उनकी चौधराहट के नीचे ही काम करती रही और कालांतर में विलास राव देशमुख, मुरली देवड़ा और गुरुदास कामत जैसे नेताओं के राज्य  के राजनीतिक परिदृश्य में बाहर जाने से ऐसे नेताओं की काफी कमी हो गई, जो पवार की आंखों में आंख डालकर बात कर सकते थे और आलाकमान के सामने भी खरी-खरी कह  सकते थे। इसके परिणास्वरूप स्थिति इतनी हास्यास्पद हो गई कि ऐन चुनाव के मौके पर नेता प्रतिपक्ष ही भाजपा के खेमें में नजर आए और 8 साल तक प्रांताध्यक्ष रहने वाले  माणिकराव ठाकरे जैसे नेता खेत रहे। पवार साहेब अपने नाती पार्थ तक को नहीं बचा पाए और ऐन चुनाव में ऐसे कई नामचीन मराठा क्षत्रप उनकी पार्टी को टाटा कह गए, जिन पर  उनकी पार्टी का दारोमदार था।
मुख्यमंत्री ने अपनी सूझबूझ से मराठा आंदोलन की हवा निकाल दी और इन दोनों दलों के क्षत्रपों को भाजपा में जगह देकर इन्हें इनकी असली जगह दिखा दी। साथ ही चुस्त-दुरुस्त शासन व्यवस्था से सूखा की स्थिति को भी चुनावी मुद्दा नहीं बनने दिया और बाकी रही सही कसर वंचित आघाड़ी ने तोड़ दी और आघाड़ी को अब तक को इतिहास के सबसे निचले  पायदान पर ही नहीं खड़ा कर दिया, बल्कि उनकी कमर ही तोड़ दी। आज जो हालात हैं, इन्हें सन्निकट विधानसभा चुनाव में सीधा खड़ा होने में परेशानी होगी। कांग्रेस की यह  शोकांतिका पृथ्वीराज चव्हाण के मुख्यमंत्रित्व और माणिक राव के प्रदेशाध्यक्ष कार्यकाल से ही लिखी जा चुकी थी। 'जब तू बड़ा की मैं बड़ा' की लॉगडाट आघाड़ी में अपने चरम पर आ  गया था और अंतत: दोनों में अलगाव हुआ और दोनों अलग-अलग चुनाव लड़े। उसके बाद एक जरूर हुए पर मन की खटास नहीं गई। अशोक चव्हाण ने अध्यक्ष के रूप में कांग्रेस को  खड़ा करने की कोशिश जरूर की, परंतु संगठन का ढांचा वैसा ही रहा, जो सही परिणाम देने में नाकाम रहा और उन्हें खुद हार का मुंह देखना पड़ा। अब इनकी जो स्थिति है, इन्हें  फिर से गौर करना है। कारण आज इनका मतदाता वर्ग कौन है, यह ये विश्वास नहीं कर सकते। कारण इन्होंने अपने क्रिया-कलापों से पूरे राज्य के मतदाता वर्ग को दुखी किया है।  सबके साथ खेल खेलते-खेलते इनके साथ ही खेल हो गया है। राज ठाकरे का पैंतरा भी नाकाम रहा। कुल मिलकार अब इन्हें अपने तौर तरीके में, टीम में व्यापक बदलाव करने की  जरूरत है और ऊपर से नीचे तक संगठनात्मक रूप से आमूल चूल बदलाव करने की जरूरत है, जो यह जल्दी कर पाएंगे ऐसा नहीं लगता है। अब इनकी जितनी दूर दिल्ली लग रही  है उससे ज्यादा दूर मुंबई की गाड़ी भी हो गई है। कारण इनके पास आज कुछ नहीं सब कुछ लूट गया है। अब इन्हें शून्य से शिखर पर आना है और यह राह काफी कठिन है।

Post a Comment

[blogger]

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget