झारखंड में बुझ गई लालू की लालटेन

रांची
चारा घोटाले के चार मामलों में रांची के बिरसा मुंडा जेल में सजा काट रहे राजद सुप्रीमो को फिर उनके एक चहेते ने जोर का झटका दिया है। पहले खासमखास कही जाने वाली  अन्नपूर्णा देवी ने ऐन लोकसभा चुनाव के समय में पाला बदल कर भाजपा का दामन थाम लिया। अबकी बार अन्नपूर्णा के बदले प्रदेश अध्यक्ष की कमान संभालने वाले गौतम सागर  राणा ने आंखें तरेरते हुए नई पार्टी के गठन की घोषणा कर दी है।
झारखंड में पहले से कमजोर राजद के लिए यह बड़ा झटका है। लोकसभा चुनाव के दौरान ही 25 मार्च को राणा को प्रदेश राजद की कमान सौंपी गई थी। बाद में बगावत करते हुए  राणा ने अभय कुमार सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद के फैसले पर ही सवाल उठा दिया था। तब बिना किसी पूर्व सूचना के इस पद पर अभय कुमार सिंह  की ताजपोशी कर दी गई थी। अभय सिंह इससे पूर्व प्रदेश युवा राजद अध्यक्ष थे।
कुछ दिन पहले ही राणा को हटाकर अभय कुमार सिंह को झारखंड राजद का प्रदेश अध्यक्ष बनाने की घोषणा की गई है। बहरहाल झारखंड राजद अब दो फाड़ हो गया है। रविवार को  पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गौतम सागर राणा की अगुआई में नई पार्टी के गठन की घोषणा की गई है। नई पार्टी का नाम राष्ट्रीय जनता दल लोकतांत्रिक पार्टी रखा गया है। उनका दावा है कि  राजद संगठन के 24 में से 18 जिलाध्यक्ष उनके साथ हैं। गौतम सागर राणा गुट का आरोप है कि प्रदेश युवा अध्यक्ष रहते हुए अभय कुमार सिंह अैर उनके सहयोगियों का आचरण  पार्टी विरोधी रहा है। पार्टी की अनुशासन समिति ने इस कृत्य के लिए अभय सिंह सहित तीन को छह वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित कर रखा है। ऐसे में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष नहीं  बनाया जा सकता। राणा ने तब सीधे-सीधे राजद सुप्रीमा के फैसले पर सवाल उठाए थे।
बता दें कि राणा को हटाए जाने के साथ ही झारखंड में नए सिरे से जमीन की तलाश कर रहा राजद दो गुटों में बंट गया था। एक गुट की अगुआई पूर्व अध्यक्ष गौतम सागर राणा  कर रहे थे, जबकि दूसरे का नेतृत्व नए अध्यक्ष अभय कुमार सिंह कर रहे थे। दोनों गुटों में इस कदर घमासान मचा कि आखिरकार राणा ने नई पार्टी के गठन की घोषणा ही कर  दी। इस दौरान एक-दूसरे के विरुद्ध जमकर शब्दों के बाण चले। बताते चलें कि आपसी तालमेल के अभाव में राजद की सांगठनिक मजबूती राज्य गठन के बाद क्रमिक रूप से कमजोर होती चली गई। अविभाजित बिहार में जहां झारखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों से राजद के नौ विधायक हुआ करते थे। 2004 में यह संख्या घटकर सात और 2009 में पांच रह गई। 2014 में राज्य से राजद का सूपड़ा ही साफ हो गया।

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