बिहार में लू और चमकी का कहर

वैसे तो पूरा देश भयंकर गर्मी का समाना कर रहा है, मानसून की देर स्थिति को और खराब कर रही है, परंतु जिस तरह यह उत्तर भारत और विशेषकर बिहार में जानलेवा बन गई है, यह चिंता के बात है। दूसरा कहर जो बिहार पर बरपा है, वह चमकी बुखार है। जिसेे कैसे नियंत्रित किया जाए, यही नहीं समझ आ रहा है और इसकी चपेट में आने वालों की जान जाने का सिलसिला रोज बढ़ता जा रहा है। इसमें अधिकारियों और मंत्रियों की हास्यास्पद बयान आग में घी का काम कर रहा है। स्वाभाविक है लोगों का आक्रोश और हताशा बढ़ रही है।  यह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रही है। केंद्र सरकार की ओर से भी इस प्रकरण पर पूरी तत्परता दिखाई जा रही है।
 केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री खुद वहां जा चुके हैं। फिर भी बच्चों के मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है और अब तो यह मामला न्यायालय तक पहुंच गया है। आवश्यक है कि राज्य सकरार पूरी तत्परता के साथ इस बीमारी के शिकार बच्चों के इलाज की समुचित व्यवस्था करे और वे सभी साधन-सुविधाएं उपलŽध हो, जिनकी मरीज को जरूरत है। साथ ही  अस्पताल के डॉ€टर और कर्मचारियों को पूरी तरह मुस्तैद किया जाए और किसी भी ढिलाई पर कड़ी कार्रवाई की जाए, जिससे मरीजों का सही और समुचित इलाज हो। इलाज और  इस कहर की रोकथाम के बाद इस संबंध में व्यापक शोध और जांच के प्रयास हों, जिससे देश के भविष्य बच्चों के जीवन पर ऐसा जानलेवा संकट दोबारा न आए। साथ ही बिहार   सरकार को अपने  प्रशासनिक और चिकित्सीय तंत्र को भी इतना चुस्त-दुरुस्त रखना होगा कि जिस तरह की लापरवाही की बातें हो रही हैं और मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों, चिकित्सकों  को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, वैसा न हो। यह बीमारी जान ले रही है और इससे निपटने के लिए हर संभव उपाय और वह भी युद्धस्तर पर होने चाहिए, कहीं भी किसी तरह  कीढिलाई या आरोप-प्रत्यारोप की कोई गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए।  रही बात लू की तो देश और दुनिया का तापमान बढ़ रहा है यह सर्वविदित तथ्य है।  
पर्यावरणविद और इसकी दुरावस्था को लेकर चिंतित लोग लागातार इस ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, परंतु हमारी लालच या बेपरवाही हमें इसे अनसुना करने को बाध्य कर  रही है। हां जल संचय और संरक्षण के पुराने तौर-तरीकों को तिलांजलि देकर सिर्फ आधुनिक मशीनों से धरती से पानी खींच रहे हैं और जिन माध्यमों से पानी बारिश के दौरान रुकता  था, उन्हें या भाठ रहे हैं या तो काट रहे हैं मसलन कुएं, तालाब, छोटी नदियां गायब हो रही हैं और वृक्ष से जंगल और बस्ती निर्जन लग रहे हैं, तो गर्मी बढ़ना, पानी के लिए  हाहाकार मचना स्वाभाविक है और वही हो रहा है, अभी तो बिहार उत्तर प्रदेश और देश के अन्य राज्यों के कुछ हिस्सों में पेयजल की, लू की, भयंकर गर्मी की समस्या हो रही है।   वह दिन दूर नहीं जब यह और विकराल होगी, इसलिए आवश्यक है कि जन-जन इन बातों को समझे और अपने लिए, अपनी भावी पीढ़ी के लिए कम से कम ऐसी कामों की  शुरुआत करे जो पर्यावरण को सही करने के दिशा में सही कदम होगा। कारण प्रकृति का हमने हर तरीके से इतना नाजायज दोहन किया है कि अब यदि उसी तरह और उससे ज्यादा  तेजी से उपचारात्मक जायज कदम नहीं उठाए गए, तो इस धारा पर जीवन की गाड़ी सही तरह चलना मुश्किल होगी। लोगों को शुद्ध हवा और शुद्ध पानी के लिए तरसना होगा।  इसलिए अपने लिए और अपने भावी पीढ़ी के लिए जागें, काम पर लगें और पूरी शक्ति तन्मयता और इमानदारी से लगें, यही वक्त की मांग है।  

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