अंत भला तो सब भला

पश्चिम बंगाल में अंतत: डॉक्टरों की हड़ताल समाप्त हो गई और इसी के साथ वहां सत्ता और चिकित्सकों में मची लॉग-डांट भी खत्म हो गई। नि:संदेह इसे उ€त राज्य और देश में जतना राहत की सांस ले रही है। कारण जिस तरह वह टकराव चल रहा था और एक-एक कर देश ने अन्य डॉक्टर भी उनके समर्थन में आगे आ रहे थे, उससे समस्या और विकराल हो रही थी और इस समय जब कई राज्य लू के चपेट में हैं और बिहार जैसे राज्य जहां लू और चमकी का प्रकोप बड़े पैमाने पर जानलेवा साबित हो रहा है, यह आवश्यक है कि चिकित्सक अपनी ड्यूटी पर मुस्तैद रहे लॉग-डांट कैसी भी हो अच्छी नहीं है और अपनी चिर परिचित तेवर का इस्तेमाल कर ममता ने यहां भी माहौल को और खराब होने दिया। यदि पहले ही उन्होंने वांछित समझदारी और धैर्य का परिचय दिया होता, तो शायद समस्या इतनी विकराल न होती और तब शायद सम्मानजनक तरीके से समस्या का समाधान निकल गया होता, न चिकित्सक परेशान होते, न जनता और उनके भी पहले अकड़ने और बाद में समर्पण करने और उनकी सब बात मान लेने की नौबत न आती फिलहाल समस्या का निदान हो चुका है। यह भी सही है कि जो व्यक्ति जहां भी नौकरी कर रहा है, उसकी जान-माल की सुरक्षा होनी चाहिए और  यो€ता को यह सुनिश्चित करना चाहिए और किसी भी व्यक्ति को चाहे कैसी भी परिस्थित हो उसे कानून अपनी हाथ में कदापि नहीं लेना चाहिए और न ही ऐसा करने का अधिकार है। कोई ऐसा करता है, तो उस पर यथोचित कार्रवाई करनी चाहिए, यह सब ठीक है, परंतु इसके साथ-साथ चिकित्सकों को भी अपनी क्रिया-कलाप को लेकर आत्म चिंतन करने की जरूरत है। अस्पताल जाने वाला व्यक्ति
प परेशान और पीड़ा से त्रस्त होता है। कई मामले चर्चा में और अनुभव में आते हैं कि जब मरीज अस्पताल पहुंचता है, जिस संवेदना और तत्परता के साथ उसका इलाज और देख रेख होनी चाहिए वैसा अस्पातालों या छोटे दवाखानों में नहीं मिलता। इससे व्यक्ति खीझता है, परेशान होता है और कभी-कभी अपना सब्र खो देता है यह कदापि नहीं होनी चाहिए, परंतु जो अस्पताल या उनके कर्मचारी ऐसी स्थिति पैदा करते हैं, उनके खिलाह कार्रवाई होनी चाहिए और उसका कोई ऐसा मैकेनिज्म विकसित होना चाहिए। जिसमें वैसा होता दिखे कोई ऐसी सरकारी या गैर सरकारी प्रभावी व्यवथा हो, जो व्यक्ति अपनी शिकायत या परेशानी इस तरह कर सके कि उसका असर उसके इलाज पर न पड़े और समस्या का भी समाधान हो सके। कारण ऐसे उदाहरण काफी हैं, जहां अस्पताल और चिकित्सक ऐसा व्यवहार करते हैं या करते पाए जाते हैं, जो उ€त व्यवसाय की उदात्त परंपराओं और मान्यताओं तथा आवश्यकताओंं के  विपरीत है, ऐसे व्यवस्था को अपनाने वाला व्यक्ति सिर्फ नौकरी नहीं करता, वह धरती पर जीवनरक्षक की भूमिका में है, उसके क्रिया-कलाप में मानवीय संवेदनाओं और कठिन समय में उसकी अपेक्षाओं पर खरा उतरना बहुत जरूरी है। कारण जब व्यक्ति अपने और अपनों के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचता है, वह पहले से ही तनावग्रस्त रहता है। उस समय उसे यह लगे कि सिर्फ तिरस्कार का कमाई का पात्र मात्र है, तो वह अपना संयम खोने लगता है, जो सही नहीं है, परंतु ऐसी  स्थिति चिकित्सालय परिसर के कर्त्ता-धर्ताओं और  चिकित्सकों और अन्य कर्मचारी वर्ग की संयम से बचे और इसे दोनों का लाभ है। मरीज या उसकी अभिभावक भी खुश और चिकित्सक और अन्य कर्मचारी भी शांति से अपना काम कर सकेंगे। हड़ताल खतम हो, परंतु इससे सबक दोनों को और सरकार को भी लेना है और यदि हर और से सही व्यवहार हुआ, तो ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति नहीं होगी।

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