कहीं भरभरा कर बैठ न जाए गाड़ी

महाराष्ट्र में चुनाव की दुंदुभी बजा चुकी है, एक ओर जहां लोकसभा की प्रचंड जीत से उत्साहित भाजपा और शिवसेना अब भावी विधानसभा की तैयारियों को लेकर मैदान में उतर  रही है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और रांकापा अभी भी लोकसभा की करारी हार की हताशा से निकलने का प्रयास कर रही है। लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही शायद ही कोई दिन राज्य में ऐसा जा रहा है, जब कांग्रेस या रांकपा का कोई न कोई नेता या कार्यकर्ता पार्टी को छोड़ महायुति का सदस्य न बन रहा है। शिवसेना और भाजपा लड़कर भी साथ-साथ  चल रही हैं, जबकि कांग्रेस और राकांपा साथ रहकर भी अलग-अलग दिख रहे हैं। दोनों दलों में एक-दूसरे पर भयंकर अविश्वास व्याप्त है। एक-दूसरे को जीभर कर कोसने का क्रम आंतरिक बैठकों में उफान पर है और यह अंतरविरोध इतना ज्यादा है कि दोनों की सामूहिक बैठकों में भी यह खुलकर सामने आ जाता है, इसके अलावा दिल्ली में राहुल गांधी का अध्यक्ष पद न स्वीकारने पर अड़े रहना और उसको लेकर पार्टी में व्याप्त उहाफोह राज्य इकाइयों की स्थिति पतवार विहीन नौका की तरह बन रहा है। कारण कांग्रेस जैसी पार्टी जहां  सब कुछ ऊपर से तय होता है ऐसी स्थिति में सिर्फ कोरमपूर्ति ही करती है और सही निर्देश के अभाव में कोई काम नहीं कर पाती है, जहां ऐसी स्थिति हो और वह स्थिति तब हो,   जब पार्टी अपने अब तक के इतिहास की करारी हारों में से एक का सामना कर रही, तो यदि सही निर्देश और नेतृत्व न मिले, तो पार्टी में भगदड़ मचना और हताशा छा जाना  स्वाभाविक है।
कांग्रेस ऐसे ही दौर से गुजर रही है और राज्य में आगामी चुनाव तक वह इस मानसिकता से उबर पाएगी ऐसा नहीं लग रहा है। कारण न ही दिल्ली की ओर से ऐसा कोई संकेत आ  रहा है और न ही प्रदेश इकाई वैसी कोई सक्रियता दिखाई दे रही है परिमाणत: चुनवी डगर काफी कठिन है। कारण पार्टी खेमों में बंटी है किसी भी नेता की रिट पूरे राज्य में नहीं चल  रही है। सभी तथाकथित दिग्गज चुनाव में खेत रही है और पार्टनर राष्ट्रवादी की हालत भी ठीक नहीं है, वहां भी खेमाबंदी जोरों पर है और दोनों में विश्वास की भयावह कमी है,  अन्य साथियों की भी हालत पतली है और वंचित आघाड़ी खेल बिगाड़ने के लिए पूरी प्राणपण डटी है। ऐसे में सब कुछ ठीक होने पर भी मुकाबला करना कठिन था, यहां तो कुएं में  ही भांग पड़ी दिखती है, जबकि शिवसेना-भाजपा युति का जोश उफान पर है और कांग्रेस राकांपा को छोड़- छोड़ कर जाने वाले नेता उसमें और बढ़ोत्तरी कर रही है, जबकि कांग्रेस- राकांपा श्री विहीन हारी हुई लड़ाई लड़ने के लिए तैयारी करते प्रतीत हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में भी जबकि चुनाव में कुछ महीनों का फासला है, आघाड़ी की गाड़ी कोई चुनौती दे  पाएगी, ऐसा नहीं लगता। कारण इन्होंने तो अभी अपनी आंतरिक कमजोरियां भी दूर करने का सिलसिला नहीं शुरू किया है। हर बड़ा नेता दूसरे छोटे नेता की आंखों की किरकिरी है।  कोई सभी गुटों को एक साथ लाने का प्रयास ही नहीं कर पा रहा है अभी भी जोड़- तोड़ और बैशाखियों पर ज्यादा भरोसा किया जा रहा है, जो एक जमाने के राज्यव्यापी जनाधार को  लगातार खिसकाती जा रही है और आज ये दोनों दल इमानदारी और दावे से यह नहीं कह सकते कि उनके साथ कौन हैं? कारण इन्होंने ने अपनी करतूतों से एक-एक करके सबका  विश्वास तोड़ा है और आज हालत यह है कि उनके साथ कोई नहीं है। ऐसी स्थिति काफी कठिन होती है और इससे उबरना काफी मुश्किल होता है। देखना यह है कि कांग्रेस और  रांकपा ऐसी विकट परिस्थिति से कैसे उबरती हैं। वे साथ कुछ कदम चल भी पाते हैं, यह चुनाव में उनकी गाड़ी भरभरा कर बैठ जाती है।

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