जनसंख्या और उसकी चुनौतियां

लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चिर परिचित शैली में उस मुद्दे को भी बड़ी सहजता पूर्वक देश सेवा के एक तरीके से जोड़ते हुए पूरे देश का उसकी ओर  ध्यान ही नहीं खींचा, बल्कि एक देशव्यापी विमर्श भी शुरू कर दिया है। यह कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है। आज कल हम बड़ी तेजी से उस दिशा में जा रहे हैं, जहां दुनिया की  जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़े राष्ट्र यानी चीन को पछाड़ कर हम दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला राष्ट्र बन जाएंगे। अतीत में इस मुद्दे ने और इसको लेकर की गई ज्यादतियों  ने इस देश में सरकार बदलने का काम किया है। जिसका कसैला स्वाद आज भी भुक्त भोगियों के मुंह में बरकरार है। जिसे मौजूदा निजाम भी वाकिफ हैं। इसलिए इसे देश सेवा के  रूप में निरुपित कर लोगों के सामने रखने का और उस उसके साथ यह रेखांकित करने का गंभीर प्रयास प्रधानमंत्री द्वारा अपने लाल किले की प्राचीर से संबोधन में किया गया है  और इसी तरह आसान तरीके से बड़ी-बड़ी बातों को सहज तरीके से आम जन मानस के गले उतारने का प्रधानमंत्री का यह कौशल ही हर योजनाओं को घरघर की योजना बना रहा है  और आज स्वच्छता देश के हर वर्ग का आंदोलन बन गया है। प्रधानमंत्री ऐसा ही कुछ जल संरक्षण और परिवार नियोजन को लेकर भी करते दिख रहे हैं। और यही तरीका सबसे   मुफीद है, जिसके तहत बिना जोर जबरदस्ती के लोगों के सामने बात पूरी इमानदारी से रखी जाती है और तत्पचात उसका ऐसा विश्लेषण होता है कि जनता उसकी अनिवार्यता को,  आवश्यकता को समझकर उस पर खुद अमल करने लगती है और आवश्यक प्रोत्साहन सरकार की ओर से जहां जरूरी है, मिलता रहता है और मंसूबा सफल होने लगता है। अतीत  की स्थितिने भले ही उस निजाम का तात्कालिक नुकसान किया परंतु इसकी जरूरत जनता की समझ में आई और बहुत बड़ा वर्ग आज इसे अपना रहा है। परंतु अभी भी हमारे  समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग है, जो इसकी महत्ता नहीं समझ पा रहा है। देश के संसाधनों की सीमा है, भूमि की सीमा है, इसका ध्यान हमें रखना होगा और मौजूदा आबादी सहित  बढ़ रही आबादी को भी उसके समुचित विकास के लिए उन सारी चीजों की आवश्यकता है, जो हर नए जीवन की लिए जरूरी है, तो उसका नियोजित और संतुलित होना भी जरूरी  है। अपनी कूबत दो बच्चों को सही तरीके से पालने पोसने की है और आपके पास आधा दर्जन बच्चे होंगे, तो कहीं न कहीं कतरव्योंत होगी है और वह कतरव्योंत आगे चलकर देश  के लिए भार बनती हैं, इसलिए हर व्यक्ति को स्वयं अपने परिवार को उतना ही विस्तार देना चाहिए, जिनका वह भरण पोषण सही तरीके से कर सकें। वे सिर्फ भीड़ न बढ़ाएं  परिवार, देश और समाज के समर्थ नागरिक बने और उनको अपने विकास की वह सब साजो सामान उपलब्ध हो। जिसकी एक मानव जीवन के समुचित विकास के लिए जरूरत होती  है। प्रधानमंत्री का पूरा जोर इस पर है कि लोग इसमें स्वयं संतुलन साधें। कारण आज हमारी धरती पर दुनिया की छठवीं आबादी रहती है। शायद ही दुनिया का कोई देश ऐसा है,  जहां हमारा अच्छा खासा प्रतिनिधित्व नहीं है यह हमारी शक्ति है, परंतु यदि ऐसी ही बढ़ोतरी होती रही, तो उसे अभिशाप बनने में भी देर नहीं लगेगी। कारण इसमें बेहतरीन बढ़ोतरी  उन निश्चित संसाधनों से तालमेल नहीं बिठा सकती और जिसके परिणाम देश के विकास के लिए, उन्नति के लिए लंबे समय में ठीक नहीं है, तो हम सबको इस दिशा में सचेत  रहते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि जनसख्या बरदान ही रहे और अभिशाप न बने और यदि हर देशवासी सतर्क हों, तो इसे बरदान बनाए रखना मुश्किल नहीं है और जैसा कि   प्रधानमंत्री ने कहा यह एक बहुत बड़ी देश सेवा होगी।

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